Victims of Oxygen Tragedy Calling BRD Officials Murderers of Their Children

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उन्होंने छीन ली मेरी 'खुशी'

by Inextlive

Sun 13-Aug-2017 07:41:03

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वह बेटी को पढ़ाना चाहते थे। उसे बड़ा अधिकारी बनाना चाहते थे, लेकिन बीआरडी में ऑक्सीजन क्या रुकी, उनकी जिंदगी की धारा ही रुक गई। यह दर्द है मोहम्मद जाहिद का, जिन्होंने अपनी बेटी खुशी को गंवा दिया। जाहिद वार्ड नंबर- 3 के बिछिया जंगल तुलसी राम मोहल्ले में रहते हैं। पढि़ए बीआरडी में मौत का शिकार हुई खुशी के पिता दास्तान

आंखों के सामने अंधेरा छा गया

शनिवार दोपहर दैनिक जागरण- आई नेक्स्ट रिपोर्टर जाहिद के घर पहुंचा। खुद को मुश्किल से संभालते हुए मोहम्मद जाहिद ने बताया कि बेटी खुशी की मौत ऑक्सीजन न मिलने के कारण हुई। अगर बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस वार्ड में भर्ती मरीजों को वक्त पर ऑक्सीजन मिल गया होता तो शायद उसकी जान बच जाती.

मो। जाहिद बताते हैं कि बेटी को बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस वार्ड में एडमिट कराए उसके बाद से वह अपने बेटी के साथ ही बेड नंबर 38 पर बने रहे। डॉक्टर जो कुछ कहते थे उसे फौरन कर रहे थे। ऑक्सीजन खत्म हुई तो डॉक्टर्स और नर्स ने यह कहा कि आप लोग अंबू बैग दबाने के लिए दिया गया। हम लोग अंबू बैग दबा रहे थे। सुबह 6 बजे जब मेरी बेटी का शरीर शिथिल हो गया तभी मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है। लेकिन डॉक्टरों ने यह नहीं बताया कि मेरी बेटी गुजर चुकी है। उसका शरीर धीरे- धीरे नीला पड़ता जा रहा था और अकड़ रहा था। फिर भी डाक्टर्स जिंदा होने की बात कर रहे थे। काफी देर बाद बताया गया कि बच्ची की मौत हो गई है। यह सुनते ही आंखों के आगे अंधेरा सा छा गया। ऐसी लापरवाही और अव्यवस्था हमने कहीं नहीं देखी।

'अचानक माइक पर अनाउंस होने लगा'

बस्ती से आए नंदकिशोर अपने मरीज को लेकर अभी भी इन्सेफेलाइटिस वार्ड में हैं। उन्होंने उस रात की बात बयां की। नंदकिशोर ने कहा कि हमें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि हालात इतने खराब हैं। अचानक रात में माइक पर अनाउंस होने लगा कि फलां- फलां पेशेंट के साथ जो लोग हैं वो आ जाएं। जैसे ही हम अंदर गए, हमसे कहा गया कि इस बैग (अंबू बैग) को दबाइए। जब हमने पूछा कि मशीन से ऑक्सीजन क्यों नहीं दे रहे हैं, तो कहा गया कि अभी ऑक्सीजन खत्म हो गया है।

हमें अंदर ही नहीं जाने दिया जा रहा

देवरिया से आए नेबूलाल इंसेफेलाइटिस वार्ड के बाहर ही बैठे थे। बेबसी में बोले कि हमें तो अंदर नहीं जाने दिया जा रहा है। हमने मरीज को एडमिट करा दिया है, लेकिन अंदर क्या इलाज चल रहा है। मरीज किस हाल में है, इस बारे में कुछ पता नहीं चल पा रहा है। उन्होंने कहा कि हमारी किस्मत अच्छी थी कि हमारे मरीज को कुछ नहीं हुआ। लेकिन यह समय हम पर बहुत भारी गुजरा है।

बेसुध हो गई मां

11 अगस्त की रात इंसेफेलाइटिस से ग्रसित नौ साल की अदिती गुप्ता इलाज के लिए वार्ड में लाया गया। लेकिन उसकी हालत इतनी खराब थी कि किसी ने भी उसकी सुधि नहीं ली। अपनी बच्ची की हालत देख पिता संतोष की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। उधर अदिती की मां बेसुध हो चुकी थी। कभी अपने पति तो कभी अपने भाई से लिपट रो- रो कर बस यही कह रही थी कि अदिती की जान बचा लिजिए। उधर शनिवार को 10 बजे तक कोई भी नहीं पहुंचा था। इसके बाद एक हेल्थ एप्लाइज से मदद की गुहार लगाई तब वे डॉक्टर को बुलाकर दिखवाया। हालांकि अभी भी उसकी स्थिति ठीक नहीं है।

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