सारागढ़ी की लड़ार्इ जब 21 सिख सैनिकों ने 10 हजार अफगान हमलावरों को हरा कर जीती जंग

2018-09-12T07:30:01+05:30

दुनिया की मशहूर जंगों में एक सारागढ़ी की जंग भी शामिल है। 12 सितंबर 1897 को 21 सिख सैनिकों ने 10 हजार अफगान हमलावरों को हराकर कुर्बानी और वीरता की एक नई कहानी लिखी थी। आइए जानें इस लड़ार्इ के बारे में

कानपुर। सारागढ़ी हिंदुकुश पर्वतमाला पर एक छोटा सा गांव है आैर हिमालय क्षेत्र के अंतर्गत आता है। हिंदुकुश उत्तरी पाकिस्तान से मध्य अफगानिस्तान को भी जोड़ता है। वर्तमान में यह इलाका पाकिस्तान में है। डब्लूडब्लूडब्लू डाॅट हिस्ट्रीएक्स्ट्रा डाॅट काॅम के मुताबिक 1897 में अफगानिस्तान के पठान सारागढ़ी पर कब्जा करने चाहते थे।
किलों पर पर कब्जा करने के लिए हमले शुरू किए थे
एेसे में 27 अगस्त को अफगानिस्तान के पठानों ने सारागढ़ी के किलों पर पर कब्जा करने के लिए हमले शुरू कर दिए थे।सारागढ़ी किले पर बनी आर्मी पोस्ट पर ब्रिटिश इंडियन आर्मी की 36वीं सिख बटालियन तैनात थी। इसमें 21 सिख सिपाही तैनात थे। इस दौरान 36वीं सिख रेजीमेंट ने अफगानियों के हमलों का डटकर मुकाबला किया था।
हमलों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए मैदान में डटे
इन हमलों के तहत अफगानियों ने लॉकहार्ट और गुलिस्तान के किलों के बीच संपर्क तोड़ने के लिए 12 सितंबर सारागढ़ी के सिग्नलिंग पोस्ट पर हमला किया। इस दौरान ब्रिटिश सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन हौटन के नेतृत्व में 21 सिख वीरों ने 10 हजार पठानों द्वारा किए जा रहे आक्रमणों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए मैदान में डटे थे।
सिखों ने प्रण कर रखा था कि वे सरेंडर नहीं करेंगे
बटालियन में सिख जवान हवलदार इशर सिंह आैर सिग्नल इंचार्ज गुरुमुख सिंह समेत दूसरे जवान लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन हॉफ्टन को ब्यौरा दे रहे थे। जंग के दौरान कर्इ एेसे में मौके आए जब लगा कि 36वीं सिख रेजीमेंट अफगानियों से घिर गर्इ आैर जवानों का साथियों से संपर्क भी टूट गया लेकिन सिखों ने प्रण कर रखा था कि वे सरेंडर नहीं करेंगे।
पार्लियामेंट 'हाउस ऑफ कॉमंस' ने गर्व महसूस किया
आखिरकार सिख जवानों के आगे अफगानी पठान थक गए। करीब 600 पठान मारे गए आैर बाकी भाग खड़े हुए। इस तरह 10 हजार अफगान हमलावरों से लड़ते हुए  हवलदार इशर सिंह, गुरमुख सिंह, जीवन सिंह समेत सभी 21 सिपाही शहीद हो गए। इनकी शहादत पर तत्कालीन ब्रिटिश पार्लियामेंट 'हाउस ऑफ कॉमंस' ने गर्व महसूस किया था।
रेजीमेंटल बैटल आनर्स डे के रूप में मनाया जाता
इतना ही नहीं इन शहीद सैनिकों को अंग्रेज सरकार ने सबसे बड़े युद्ध पदक से नवाजा था।वहीं कुछ समय बाद अमृतसर में गुरुद्वारा साहिब का निर्माण सारागढ़ी स्कूल भी बनाया गया था। 12 सितंबर को सारागढ़ी डे मनाया जाता है। खास बात तो यह है कि आज भी भारत में सिख रेजीमेंट इसे रेजीमेंटल बैटल आनर्स डे के रूप में भव्य तरीके से मनाता है।
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