आचार्य विनोबा भावे ने इस तरह राजा का पुत्र बन 2000 बीघा जमीन गरीबों में बांटी

2018-09-11T10:41:00+05:30

भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सामाजिक कार्यकर्ता आचार्य विनोबा भावे ने समाज के लिए अनेक लड़ाइयां लड़ी लेकिन उनका भूदान आंदोलन राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। आइए आज उनकी बर्थ एनिवर्सिरी पर जानें अलीगढ़ के पिसावा में उनके भूदान के एक किस्से के बारे में

कानपुर। आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर, 1895 को हुआ था। आचार्य विनोबा तो आज इस दुनिया में नहीं है लेकिन समाज में योगदान के किस्से प्रचलित हैं। पिसावा के राजा श्यौदान सिंह का पुत्र बन कर जमीन लेने वाला किस्सा तो कुछ ज्यादा ही रोचक रहा। राजा के वशंज कुंवर महेंद्र सिंह ने दैनिक जागरण से एक बातचीत में उनके भूदान आंदोलन के बारे में विस्तार से बताया। उनके मुताबिक विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन 18 अप्रैल 1950 को शुरू किया था। इसके तहत वह जमींदारों, राजाओं व धनाढ्य परिवारों के पास जाकर उनसे जमीन दान करने को कहते थे, जिससे कि उस जमीन से गरीब आैर असहाय लोग उससे अपना जीवन बसर कर सकें।
यह किस्सा कम ही लोगों को पता
वह यह सब निस्वार्थ भाव से करते थे। कुंवर महेंद्र सिंह ने बातचीत के दौरान आचार्य विनोबा भावे का अलीगढ़ जिले के पिसावा स्टेट के राजा श्यौदान सिंह वाला किस्सा कम ही लोगों को पता है। कुंवर  ने बताया कि गांधी जी के प्रिय शिष्य आचार्य विनोबा भावे जब भूदान आंदोलन के तहत अलीगढ़ के पिसावा पहुंचे और यहां के दानशील राजा श्यौदान सिंह को सूचना भिजवार्इ।राजा ने जनसभा में आचार्य विनोबा भावे का शानदार स्वागत करते हुए उनके अलीगढ़ आने का कारण पूछा। इस पर विनोदा भावे ने कहा कि महाराज, आप मुझे गोद ले लीजिए। यह सुनते ही जनसभा में लोग हंसने लगे लेकिन श्यौदान सिंह चुप रहे। वह समझ गए कि विनोबा की यह बात हल्की नहीं है।
राजा ने कहा मुझे प्रस्ताव स्वीकार
इस पर राजा ने कहा मुझे यह प्रस्ताव स्वीकार है। मैं घोषणा करता हूं कि आपको विधिवत गोद लूंगा। यह सुनकर जनसभा में सन्नाटा पसर गया। वहीं राजा की घोषणा के कुछ पल बाद ही विनोबा ने कहा कि पिताजी, अब आप मुझे अलग कर दीजिए। मैं आपका तीसरा पुत्र हूं। इसलिए आप मुझे मेरे हिस्से की भूमि के रूप में छठवा हिस्सा दे दीजिए। इसके बाद राजा श्यौदान सिंह ने 2000 बीघा जमीन आचार्य विनोबा भावे को देने का एेलान कर दिया। वहीं आचार्य विनोबा भावे ने इसके बाद पिसावा के बेघर-निर्धनों के बीच उस जमीन को बांट दिया था। वहीं विनोबा भावे के इस फैसले से राजा श्यौदान सिंह भी काफी खुश हुए थे। इसके बाद से वह भी गरीबों की मदद करने लगे थे।

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