बिना लिवर ट्रांसप्लांट के भी ठीक हो सकते हैं लिवर के गंभीर मरीज

2019-06-17T06:00:28+05:30

- 12 मरीजों को अब तक ठीक हो चुके हैं

- 40 से 50 हजार तक आता है खर्च

- 14 से 15 यूनिट प्लाज्मा की जरूरत पड़ती है

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- केजीएमयू के डॉ। डी हिमांशु को प्लाज्मा फेरेसिस से इलाज करने में मिली सफलता

- एसजीपीजीआई के डॉक्टर ने साथ मिलकर किया इलाज

LUCKNOW: रमेश लिवर की गंभीर समस्या के साथ केजीएमयू पहुंचे थे। बिलरुबिन लेवल 30 से ऊपर था। हेपेटाइटिस ई पाजिटिव थे। गंभीरता को देखते हुए वेंटीलेटर पर भर्ती किया गया, लेकिन लिवर की दिक्कत के कारण तुरंत लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यक्ता थी, लेकिन डॉक्टर्स ने चार बार प्लाज्मा फेरेसिस किया, जिसके बाद रमेश की बीमारी ठीक हो गई और वह चलते फिरते हुए घर वापस गए। वह लिवर की समस्या से पूरी तरह ठीक हो चुके थे।

श्वेता भी आई थी गंभीर हालत में

ऐसे ही एक अन्य मरीज श्वेता गंभीर हालत में आई थी। बिलरुबिन लेवल हाई था। हेपेटाइटिस ई पाजिटिव के साथ उन्हें आटो इम्यून डिस्आर्डर की समस्या थी। बिलरुबिन लेवल बढ़ा तो बेहोशी की हालत में वेंटीलेटर पर थी। उन्हें भी लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यक्ता थी। डॉक्टर्स ने उन्हें भी करीब पांच बार प्लाज्मा फेरेसिस किया, जिसके बाद वह ठीक होकर घर गई।

50 से ऊपर बिलरुबिन, किडनी भी थी खराब

ऐसे ही दो अन्य मरीज भी थे जिनका बिलरुबिन लेवल 50 से ऊपर पहुंच गया और लिवर के कारण किडनी भी अफेक्ट हुई, लेकिन डॉक्टर्स ने प्लाज्मा फेरेसिस किया तो दोनों ही ठीक हो गए। ऐसे करीब 12 मरीजों को केजीएमयू के मेडिसिन विभाग के डॉ। डी हिमांशु ने ठीक कर लिया है। यह सब उस कैटेगरी के मरीज थे जिनका लिवर ट्रांसप्लांट न हो पाने पर आधे से अधिक की मौत हो जाती है। डॉ। डी हिमांशु ने बताया कि प्लाज्मा फेरेसिस से लिवर की समस्याओं को ठीक करने के इस प्रयोग में एसजीपीजीआई के गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग के डॉ। अमित गोयल भी शामिल हैं। साथ ही केजीएमयू के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की डॉ। तूलिका चंद्रा और एसजीपीजीआई ट्रांसफ्यूजन के डॉ। धीरज खेतान का अहम योगदान है।

सिर्फ 40 से 50 हजार में मरीज ठीक

अभी तक लिवर ट्रांसप्लांट में प्राइवेट अस्पतालों में करीब 80 लाख का खर्च आता है जबकि प्लाज्मा फेरेसिस में प्रति साइकिल करीब 8 हजार का खर्च आता है। इस प्रकार से केजीएमयू के मेडिसिन विभाग में प्लाज्मा फेरेसिस फेरेसिस से ज्यादातर मरीज 40 से 50 हजार रुपए में ही ठीक हो गए। ये मरीज बिना लिवर ट्रांसप्लांट कराए ही अपनी पूरी जिंदगी जी सकेंगे।

सिरोसिस के मरीजों में कारगर नहीं

डॉ। डी हिमांशु ने बताया कि लिवर के मरीज एक्यूट लिवर फेल्योर, एक्यूट आन क्रोनिक लिवर फेल्योर और लिवर सिरोसिस कैटेगरी के होते हैं। इन सभी मरीजों में कुछ समय इलाज के बाद लिवर ट्रांसप्लांट ही आखिरी ऑप्शन होता है, लेकिन अब जिन मरीजों में सिरोसिस की स्थिति नहीं है उनमें से ज्यादातर को प्लाज्मा फेरेसिस के जरिए ही ठीक किया जा सकेगा। डॉ। डी हिमांशु ने बताया कि पहले इन मरीजों को बेसिक ट्रीटमेंट दिया जाता है। यदि लिवर इम्प्रूव हुआ तो ठीक है। न होने पर ही फेरेसिस दिया जाता है। इससे हम बहुत बड़ी संख्या में मरीजों को लिवर ट्रांसप्लांट में जाने से बचा सकेंगे। डॉ। डी हिमांशु ने बताया कि प्लाज्मा फेरेसिस के जरिए कई बीमारियों के इलाज किया गया है लेकिन लिवर के लिए इतने बड़े स्तर पर पहली बार कामयाबी मिली है।

प्लाजा फेरेसिस

लिवर में दिक्कत हो पर व्यक्ति को जाइंडिस या पीलिया हो जाता है। इसका असर ब्लड में रहता है इसलिए मरीजों के ब्लड से प्लाज्मा को पूरी तरह से निकाला जाता है। इसके लिए केजीएमयू के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग में फेरेसिस मशीन लगी है, जिसमें मरीज का ब्लड जाता है और उसमें से प्लाज्मा को छानकर शेष ब्लड फिर से मरीज में चढ़ा दिया जाता है। साथ ही दूसरे मरीज का प्लाज्मा मरीज को चढ़ाया जाता है। एक मरीज में करीब 14 से 15 यूनिट प्लाज्मा की आवश्यक्ता पड़ती है। स्वस्थ्य व्यक्ति का प्लाज्मा मिलने से उसकी लिवर की समस्या को ठीक कर लिया जाता है।

सिरोसिस में कारगर नहीं

डॉ। डी हिमांशु के अनुसार लिवर सिरोसिस में यह कारगर नहीं है। उनमें में लीवर ट्रांसप्लांट ही कराना पड़ता है, लेकिन ऐसे मरीज जिनमें 20 से 25 दिनों में अचानक किसी इंफेक्शन, टॉक्सीसिटी, वायरल इंफेक्शन, हेपेटाइटिस बी व ई, एल्कोहाल के लिवर खराब हो गया हो उन मरीजों के लिए प्लाज्मा फेरेसिस अब तक कारगर साबित हुआ है।

तो दिखाएं डॉक्टर को

पेशाब और आंख में पीलापन, पैरों, पेट में सूजन होने, भूख ना लगना ये लक्षण लिवर की बीमारी के हो सकते हैं। ऐसे में तुरंत डॉक्टर्स को दिखाएं।

inextlive from Lucknow News Desk


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