अतिक्रमणकारी बन गया याचक 10 हजार हर्जाना

2019-02-07T06:00:46+05:30

एकल पीठ का आदेश रद, कोर्ट ने कहा, जनहित की जांच के बाद ही जारी करना चाहिये समादेश

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि निजी लाभ व दूषित मन से दाखिल जनहित याचिका पर समादेश जारी नही किया जा सकता। कोर्ट को याची के उद्देश्यों व याचिका में निहित जनहित की जांच के बाद ही समादेश जारी करना चाहिए। खुद सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करने वाले द्वारा दूसरे लोगों के अतिक्रमण को हटाने के लिए जनहित याचिका दाखिल की गई। कोर्ट ने आदेश भी जारी कर दिया। विपक्षीगण ने इस गलत इरादे से दाखिल याचिका पर पारित आदेश को विशेष अपील में चुनौती दी। खण्डपीठ ने अपना हित साधने के लिए दाखिल जनहित याचिका पर एकलपीठ के आदेश को रद्द कर दिया है और ऐसी याचिका दाखिल करने वाले याची पर 10 हजार हर्जाना लगाया है। कोर्ट ने कहा है कि 2 हफ्ते में हर्जाना राशि विधिक सेवा समिति हाई कोर्ट में जमा की जाय। कोर्ट ने दोनों पक्षो को कानून के तहत कार्यवाही करने की छूट दी है।

अतिक्रमणकारी ने दी अतिक्रमण की अर्जी

यह आदेश जस्टिस भारती सप्रू तथा जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की खंडपीठ ने मेरठ के निवासी किशन कुमार त्यागी व 2 अन्य की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए दिया है। खरखौदा, मेरठ के निवासी सुरेश चन्द्र शर्मा ने जनहित याचिका दाखिल कर अपीलार्थी विपक्षियो द्वारा गांव सभा की भूमि किये गए अतिक्रमण को हटाने की मांग की गयी। कोर्ट ने एसडीएम को याची की शिकायत पर राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत खसरा संख्या 1197 से अतिक्रमण हटाने का आदेश देते हुए याचिका निस्तारित कर दी। जिसे चुनौती दी गयी थी। अपील में कहा गया कि याची ने खुद सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया है। अपीलार्थियों ने शिकायत की तो स्वयं को बचाने के लिये जनहित याचिका दाखिल कर अपीलार्थियों के विरूद्ध अतिक्रमण करने पर कार्यवाही की मांग की। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन का हवाला देते हुए कोर्ट को जनहित याचिका की जांच करके ही समादेश जारी करने का आदेश दिया.

inextlive from Allahabad News Desk


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