मनमानी फीस की मार पैरेंट्स बेहाल

2018-08-20T04:17:03+05:30

देश की आजादी को वर्षों हो गये हैं। इस दौरान कई सरकारें आईं और चली गईं लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में जो बदलाव आने चाहिए थे वे नहीं आए। न तो शिक्षा के स्तर में सुधार हुआ और ना ही प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर रोक लग सकी।

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LUCKNOW : आज भी हाल यह है कि कई स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं तो कई स्कूलों में पहली से आठवीं तक के बच्चों को एक ही कमरे में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। सरकारी स्कूलों की इसी दशा का फायदा उठाकर प्राइवेट स्कूल बच्चों को शिक्षित करने के नाम पर मनमानी फीस वसूल रहे हैं। 85 प्रतिशत शिक्षा व्यवस्था है। निजी स्कूलों के हाथों में आजादी के बाद करीब 40 साल तक लगभग 95 प्रतिशत से अधिक बच्चे सरकारी स्कूलों में पढऩे जाते थे। आज यह आकड़ा केवल 15 प्रतिशत के करीब ही रह गया है। प्रदेश की 85 प्रतिशत शिक्षा निजी स्कूलों की हाथ में है। इसका प्रमुख कारण है कि सरकारी स्कूलों में न तो संसाधन हैं और ना ही बच्चों के विकास के लिए कोई व्यापक योजना।

छात्र क्लास दो की किताब नहीं पढ़ पाते

एक रिपोर्ट के  मुताबिक क्लास थर्ड के 23.6 प्रतिशत छात्र क्लास दो की किताब नहीं पढ़ पाते हैं। वहीं क्लास फाइव के 49.1 प्रतिशत छात्र क्लास तीन की किताब नहीं पढ़ पा रहे हैं। वहीं गांव देहात, अद्र्ध शहरी क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की स्थिति ऐसी हो गई है कि वहां शिक्षकों को सरकारी योजनाओं का कार्यान्वयन, पोलियो ड्रॉप पिलाने के काम, चुनाव मतदाता सूची एवं मतदान कार्यो और जनगणना में लगाया जाता है। वहीं प्राइवेट स्कूलों की फीस इतनी अधिक है कि अब वहां बच्चों को पढ़ाना
शिक्षा देने के आड़ में मनमानी फीस लेते
मध्यम वर्ग की जेब से बाहर होता जा रहा है। लेकिन किसी तरह मजबूरी में वे वहां अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। पूरे बजट का 85 प्रतिशत सरकारी शिक्षा पर माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रवक्ता डॉ। महेंद्र नाथ राय बताते हैं कि प्रदेश सरकार अपने  कुल शिक्षा बजट का 85 सरकारी स्कूलों पर खर्च करती है। इन स्कूलों में पढऩे वाले छात्रों की संख्या कुल छात्रों की संख्या का मात्र 15 प्रतिशत ही है। शेष 85 प्रतिशत छात्र निजी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे है।  सरकार की ओर से निजी स्कूलों को कोई ग्रांट नहीं दी जाती है। जिससे यह स्कूल  गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देने के आड़ में मनमानी फीस लेते हैं।
सीटे आधी दावेदार दोगुने
राजधानी में यूजी कोर्सेस में एडमिशन के लिए हर साल मारामारी होती है। एलयू सहित सभी डिग्री कॉलेजों में एडमिशन के लिए निर्धारित सीटों से तीन गुणा तक आवेदन आते हैं। क्योंकि यहां पढ़ाई निजी संस्थाओं से काफी सस्ती है। एलयू व डिग्री कॉलेजों में एडमिशन के लिए यूजी की कुल 51687 सीटों हैं। इन सीटों के  मुकाबले राजधानी में केवल यूपी बोर्ड से ही 40 हजार, आईएससी से 11000 और सीबीएसई से 13 हजार स्टूडेंट्स हर साल बोर्ड एग्जाम पास करते हैं। इस हिसाब से राजधानी में 52 हजार सीटों के मुकाबले 65 हजार स्टूडेंट्स दावेदारी पेश करते ह
सरकारी स्कूलों में मौजूद सुविधा
- बिजली की सुविधा 50.11 प्रतिशत स्कूलों में
- पुस्तकालय की सुविधा 74.66 प्रतिशत स्कूलों में
- खेल के मैदान 69.27 प्रतिशत स्कूलों में
- कंप्यूटर की सुविधा 6.67 प्रतिशत स्कूलों में
बीते दो दशकों में निजी शिक्षा
संस्थाओं को तेजी से बढ़ावा दिया गया है। जिसका असर सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर साफ दिख रहा है। आज पैरेंट्स अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। जहां क्वालिफाइड टीचर ही नहीं हैं।
- डॉ. आरपी मिश्रा, प्रवक्ता, शिक्षक संघ
आमतौर पर स्टूडेंट्स एक ही जगह एडमिशन के लिए आवेदन करता है। वहां एडमिशन न मिलने पर भी वह  दूसरी जगह के बारे में नहीं सोचता। ऐसे स्टूडेंट्स को कॉलेज या यूनिवर्सिटी का मोह छोड़ बेहतर ऑप्शन तलाशने होंगे।
- डॉ. एससी शर्मा, प्राचार्य, केकेसी पीजी कॉलेज

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