बढ़ेगी बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सक्सेस रेट केजीएमयू के साइंटिस्ट ने खोजा क्षमता बढ़ाने वाला जीन

2018-08-20T03:49:57+05:30

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के डॉक्टर सत्येंद्र कुमार सिंह ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट के दौरान स्टेम सेल्स की कार्य क्षमता बढ़ाने वाली जीन का पता लगा लिया है।

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LUCKNOW : इस रिसर्च से आने वाले समय में बोन मैरो ट्रांसप्लांट (स्टेम सेल्स) की सफलता दर काफी बढ़ जाएगी। इससे मरीजों में कई बार बोन मैरो या स्टेम सेल ट्रांसप्लांट नहीं करना पड़ेगा और मरीजों का लाखों का खर्च बचेगा। अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट डाॅक्टर जॉनाथन केलर के साथ की गई रिसर्च को इसी माह तीन अगस्त के अंक में 'सेल स्टेम सेल' जर्नल ने प्रकाशित किया है।

चूहों पर किया सफल प्रयोग

केजीएमयू की सेंटर फार एडवांस रिसर्च में स्टेम सेल डिवीजन के डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह ने बताया कि पिछले कई वर्षों से वह हिमैटोपोइटिक स्टेम सेल्स पर रिसर्च कर रहे थे। केजीएमयू के ही एनीमल हाउस में उन्होंने चूहों पर इसका परीक्षण किया। जिसमें उन्होंने ऐसे जीन का पता लगाया जो स्टेम सेल्स की स्टेमनेस के लिए जिम्मेदार होता है। चूहों पर किए गए प्रयोग में पाया कि यही जीन स्टेम सेल्स की एजिंग के लिए भी जिम्मेदार होता है। 'आईडी वन' नाम के इस जीन को सप्रेस करने से स्टेम सेल्स के नष्ट होने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के बाद सफलता दर काफी अधिक बढ़ जाती है। चूहों पर सफलता मिलने के बाद अब इंसानों में इसका ट्रायल करेंगे। इंसानों में यह रिसर्च सफल रहा तो Žलड में होने वाली समस्याओं जैसे एप्लास्टिक एनीमिया,  ब्लड कैंसर जैसी समस्याओं के मरीजों को बहुत लाभ मिलेगा।
ऐसे बढ़ती है सफलता दर
उदाहरण के तौर पर समझें तो स्टेम सेल ट्रांसप्लांट या बोन मैरो ट्रांसप्लांट में करीब आधी स्टेम सेल्स नष्ट हो जाती है और आधी यानी 50 फीसद ही काम आती है। आईडीवन जीन इसके लिए जिम्मेदार होता है। अब इस जीन को जैक स्टेट इनहिबिटर या आईडी वन इनहिबिटर से सप्रेस करने पर जीन के नष्ट होने की प्रक्रिया धीमी हो जाएगी। यानी इस विधि को अपनाने से करीब 80 से 90 फीसद तक स्टेम सेल्स मरीज में नई कोशिकाएं बनाने का काम करेंगी। सीधे शब्दों में कहें तो स्टेम सेल्स की कार्य क्षमता बढ़ जाएगी

क्या है स्टेम सेल्स

स्टेम सेल्स शरीर में वे कोशिकाएं होती हैं, जिनसे नई कोशिकाएं और अंगों के विकसित करने में मदद मिलती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इनसे शरीर की कोशिकाओं या अंगों को मरम्मत करने में मदद मिलती है। ज्यादातर इन्हें हड्डी में होने वाले बोन मैरो से निकाला जाता है। उसके बाद इन्हें जरूरत वाले हिस्से में ग्राफ्ट किया जाता है।

मुंह के कैंसर पर कर रहे काम

डाॅक्टर सत्येंद्र कुमार सिंह केजीएमयू में मुंह के कैंसर में पर्सनलाइज्ड मेडिसिन एवं रीजनरेटिव मेडिसिन पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी इस रिसर्च के लिए वीसी प्रो। एमएलबी भट्ट, डीन रिसर्च प्रो। आरके गर्ग और प्रो। अमिता जैन के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया है।

दोबारा ट्रांसप्लांट की जरूरत नहीं

डाॅक्टर सत्येंद्र कुमार सिंह ने बताया कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट में बड़ी संख्या में स्टेम सेल्स के नष्ट होने से कई बार रिजल्ट उतने अच्छे नहीं आ पाते। मरीज में दो, तीन या अधिक बार ट्रांसप्लांट करना पड़ता है। अब एक बार में ही ट्रांसप्लांट के सफल होने और मरीज को लाभ मिलने से बार बार ट्रांसप्लांट का लाखों का खर्च बचेगा। बता दें कि वर्तमान में बोन मैरो ट्रांसपलांट का खर्च करीब 8 से 12 लाख का आता है, लेकिन मरीज की जान बचाने के लिए यह आवश्यक होता है।

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