खतरे में नौनिहाल कोई नहीं जिम्मेदार

2019-04-03T06:00:15+05:30

ओवरलोड और खटारा वाहनों से बच्चे जा रहे स्कूल

स्कूल संचालक नहीं दे रहे ध्यान, पेरेंट्स भी नहीं सजग

MEERUT। घर से स्कूल तक के सफर स्कूली बच्चों के लिए काफी रिस्की हो गया है। नियमों को ताक पर रख स्कूली वाहन बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। बिना जिम्मेदारी और बिना सुविधाओं के चलने वाले खटारा और ओवरलोडेड वाहन कभी भी खतरनाक हो सकते हैं। इन वाहनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी न तो स्कूल प्रशासन तय करता है न ही वाहन चालक का कोई सरोकार है। हादसा होने पर भी सभी अपना पल्ला झाड़ते नजर आते हैं। स्थिति यह है कि बसों, ऑटो समेत रिक्शा तक में लिमिट से ज्यादा बच्चे बैठाए जा रहे हैं।

ये है सीबीएसई की गाइडलाइन

- व्हीकल के आगे-पीछे स्कूल बस लिखा होना चाहिए ।

- बस में फ‌र्स्ट-एड बॉक्स लगा होना चाहिए ।

- फायर सेफ्टी सिस्टम लगा होना चाहिए।

- अगर एजेंसी से बस कॉट्रेक्ट पर हो तो उस पर ऑन स्कूल ड्यूटी लिखा होना चाहिए।

- सीट लिमिट से अधिक बच्चे स्कूली वाहन में नहीं होने चाहिए।

- स्कूल वाहन में हॉरिजेंटल ग्रिल (जालियां) लगे होनी चाहिए

- स्कूल वाहन पीले रंग का हो, जिसके बीच में नीले रंग की पट्टी पर स्कूल का नाम और फोन नंबर लिखा होना चाहिए ।

- बसों के दरवाजे को अंदर से बंद करने की व्यवस्था होनी चाहिए ।

- बस में सीट के नीचे बैग रखने की व्यवस्था होनी चाहिए।

- बसों में टीचर जरुर होने चाहिए,

यह है ड्राइवर के नियम

- प्रत्येक बस चालक को कम से कम 5 साल का भारी वाहन चलाने का अनुभव हो।

- किसी भी ड्राइवर को रखने से पहले उसका वैरिफिकेशन जरूरी है।

- ड्राइवर या कंडक्टर का कोई रिकार्ड में कोई चालान नहीं होना चाहिए और न ही उसके खिलाफ कोई मामला दर्ज हो।

- ड्राइवर व कंडक्टर मेडिकल फिट होने चाहिए।

- ड्राइवर या कंडक्टर के लिए यूनिफार्म निर्धारित हैं। स्कूली बसों में जीपीएस, फोन की सुविधा भी होनी चाहिए।

कोट्स

ट्रांसपोर्ट आसानी से मिलते नहीं हैं। बच्चों को स्कूल भेजने के लिए बनी-बनाई व्यवस्था से ही काम चलाना पड़ रहा है। मजबूरी में ही बच्चों के लिए व्हीकल लगाने पड़ते है।

प्रियांशु पेरेंट्स

बच्चों को अच्छी एजुकेशन दिलाने के लिए अच्छे स्कूल में भेजते हैं। वहां से घर दूर है। बस अंदर नहीं आती है, ऐसे में ऑटो या रिक्शा लगवाना पड़ता है।

अनिल, पेरेंट्स

बच्चों को स्कूल में पढ़ाना है। तो स्कूलों के नियम मानने ही पड़ते हैं। ट्रांसपोर्ट के लिए व्हीकल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। ऐसे में मजबूरी हाे जाती है।

एकता, पेरेंट्स

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स्कूल सिर्फ अपने व्हीकल के लिए जिम्मेदार होते हैं। अधिकतर स्कूलों के वाहन अपडेटेड हैं और उन्हें पूरे नियमों व मानकों के अनुसार ही तैयार कराया जाता है। प्राइवेट व्हीकल पेरेंट्स अपनी मर्जी से लगवाते हैं। इसके लिए स्कूल जिम्मेदार नहीं हैं।

राहुल केसरवानी, सहोदय सचिव

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स्कूलों की ओर से पेरेंट्स को समय-समय पर सेफ ट्रांसपोर्ट के लिए अवेयर किया जाता है। प्राइवेट या स्कूल का वाहन लगाना पेरेंट्स निर्णय होता है। कई बार पेरेंट्स वाहनों को लेकर संजीदा नहीं रहते और सस्ते वाहनों का विकल्प ढ़ूंढ लेते हैं। इसमें स्कूलों की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है।

नाजिश जमाली, एकेडमिक डायरेक्टर, शांति निकेतन विद्यापीठ

inextlive from Meerut News Desk


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