मेरा नाम नीरा नहीं नीरज है

2011-09-10T09:05:02+05:30

आई नेक्स्ट के रीडर बृजेंद्र पिछले दिनों अपने दोस्त का माइग्रेशन सर्टिफिकेट बनवाने सीएसजेएम यूनिवर्सिटी गए थे वहां उन्होंने जो कुछ झेला वो किसी मुसीबत से कम नहीं था

बृजेंद्र अकेले नहीं थे. सैकड़ों स्टूडेंट्स उन्हीं ·कि तरह परेशान थे. वो खामोश नहीं बैठे. एक जिम्मेदार सिटिजन जर्नलिस्ट का रोल निभाते हुए बृजेंद्र ने आई नेक्स्ट को ये बात बताई. इसके आगे आई नेक्स्ट ने जो कुछ देखा-जाना वो आपके सामने है.
मजबूरन जमा करने पड़े 100 रुपए

यूनिवर्सिटी में सैटरडे ·का सीन आपके सामने रखने से पहले आपको वो बता दें जो बृजेंद्र ने झेला. वो बताते हैं, मैं अपने दोस्त का माइग्रेशन सर्टीफिकेट निकलवाने गया था. मार्कशीट में एनरॉलमेंट नंबर न होने की वजह से दोबारा नंबर दर्ज कराने गया लेकिन इसके लिए 100 रुपए लिए जा रहे थे. मेरा ऑब्जेक्शन था कि जब फर्स्‍ट इयर में 100 रुपए पहले ही ले लिए गए थे तो दोबारा लेने का क्या मतलब. मेरी बात किसी ने नहीं मानी. वहां लाइन में लगभग 400 स्टूडेंट्स इसी काम से खड़े थे और सभी से ही 100 रुपए लिए जा रहे थे. मजबूरन मुझे भी दोबारा 100 रुपये जमा करने पड़े. मगर, मैंने सोचा ·कि आई नेक्स्ट ·के जरिए ये बात जरूर सब लोगों तक पहुंचाऊंगा.
मुश्किलें और भी हैं
जब आई नेक्स्ट की टीम यूनिवर्सिटी पहुंची तो हमें कई स्टूडेंटस ऐसे मिले जिनके हाथों में अपनी-अपनी मुश्‍किलों के फॉर्म थे. कोई माइग्रेशन सर्टिफिकेट के लिए परेशान था तो कोई मार्कशीट और रिजल्ट समय पर न आने से परेशान था. वहां मौजूद सभी स्टूडेंट्स पहली बार नहीं बल्‍कि कई दिनों से चक्कर लगा रहे थे. जब हमने स्टूडेंट्स से पूछा कि उन्हें सबसे ज्यादा ·किस बात की दिक्‍कत है तो सबका एक ही जवाब था कि यहां कोई सही इंफॉरमेशन देने वाला नहीं हैं. ·किसी भी इंफॉरमेशन को लेने के लिए एक काउंटर से दूसरे काउंटर पर चक्कर लगाने पड़ते हैं.
नहीं मिलती सही जानकारी
बरेली, लखनऊ, बिजनौर, इलाहाबाद जैसे शहरों से रोज स्टूडेंट्स सीएसजेएम यूनिवर्सिटी आते हैं, अपनी एक प्रॉब्लम को बताने के लिए उन्हें घंटो इंतजार करना पड़ता है, कई बार तो सुविधा शुल्क के नाम पर पैसे भी देने पड़ते हैं, उसके कई दिनों बाद ही बात बनती है. स्टूडेंट्स का कहना है कि काउंटर पर कई बार लोग ही नहीं रहते और अगर बैठते भी है तो उनके पास सही इंफॉरमेशन नहीं होती.
बवाल करने पर ही होता है काम
सैटरडे को प्रोविजनल सर्टीफिकेट लेने आए स्टूडेंट्स को पहले काउंटर बंद है और मंडे को ही सर्टीफिकेट मिलेगा ये ·कहकर टाला गया, यही नहीं स्टूडेंट्स ·को धक्के मारकर बाहर भी निकाला. लेकिन जब स्टूडेंट्स ने शोर मचाया तब उनकी बात सुनी गई. स्टूडेंट्स के पास इस बात की फोटो कॉपी भी थी जिसमें ये लिखा था ·कि 10 सितंबर 2011 ·को दोपहर 2 बजे सर्टीफिकेट मिलेगा. शोर मचाने के बाद काउंटर को 3 बजे खोला गया और 4 बजे तक स्टूडेंट्स ·को सर्टीफिकेट दिए गए.
मेरा नाम नीरा नहीं नीरज है
हरदोई में रहने वाले नीरज की परेशानी उनकी मेहनत पर पानी फेर रही है. उन्होंने एग्जाम, उसकी मार्कशीट भी है, गुड सेकेंड डिवीजन आने पर भी कोई इस पर विश्वास ही नहीं कर रहा है. जी हां, नीरज की मार्कशीट में उनका नाम नीरा कुमार प्रिंट है. अपना सही नाम कराने के लिए वो कई दिनों से यूनिवर्सिटी के चक्कर लगा रहे हैं.



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