कार्रवाई करेगी सरकार तो भरोसा रहेगा बरकरार

2019-02-16T01:48:39+05:30

RANCHI : देश की राजनीति में मिलेनियल्स की राय काफी अहम हो गई है, क्योंकि ये वह आयु वर्ग है, जो इस बार चुनाव में सबसे बड़ी संख्या में वोट देने के लिए तैयार है। 18 से 38 साल के आयु वर्ग के युवाओं को मिलेनियल्स स्पीक के तहत दैनिक जागरण- आई नेक्स्ट ने मंच दिया है, जिसका नाम है राजनीटी। शुक्रवार को इस कार्यक्रम का आयोजन रांची यूनिवर्सिटी के कैंपस में किया गया। यहां युवाओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे को लेकर अपने विचार रखे.

डिगा नहीं है विश्वास

गुरुवार को जम्मू- कश्मीर के पुलवामा में आतंकी हमले में मारे गए जवानों की शहादत ने युवाओं को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना ने लोगों को आहत तो किया है, लेकिन हौसले कहीं से कम नहीं हुए हैं। यूनिवर्सिटी कैंपस में आयोजित चर्चा में युवाओं ने इसे राजनीति का एक मुद्दा जरूर माना, लेकिन यह भी कहा कि इससे लड़ने में देश सक्षम है और अगली बार सरकार चुनते वक्त उनके दिलो- दिमाग में यह मुद्दा जरूर कौंधेगा। वैसे, अधिकतर युवाओं का मानना है कि ऐसी घटनाओं से मुकाबला करने में मौजूदा सरकार पूरी तरह से सक्षम है और समय पर आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब भी दिया जाएगा.

सुरक्षा जरूर होगा बड़ा मुद्दा

देश की आंतरिक सुरक्षा के मसले पर युवाओं ने अपनी राय देते हुए कहा कि बेशक यह एक बड़ा मुद्दा होगा, जिस पर चुनावी बिसात बिछेगी। अहम यह है कि इस बात की गारंटी कौन लेगा कि अब ऐसी घटनाएं नहीं होंगी। बड़ा सवाल यह भी है कि ऐसी आतंकी घटनाएं जब पहले होती थी, तब की सरकार का क्या रुख होता था और अब मौजूदा सरकार का क्या रुख होगा? वोटर्स इस बात की समीक्षा जरूर करेंगे कि कार्रवाई की तीव्रता क्या होती है। देश की सुरक्षा के साथ ही जुड़ा है हमारे सुरक्षा बल की हिफाजत। अधिकतर स्टूडेंट्स का कहना था कि यह एक ऐसा मसला है, जिसपर लंबे अर्से से चर्चा हो रहा है लेकिन कोई ठोस उपाय अभी तक नहीं ढूंढ़ा जा सका है। वैसे मोदी सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की जो नीति अपनाई है, उसे कार्रवाई के स्तर तक ले जाकर भी दिखाया है। उरी हमले के बाद पाकिस्तान की सीमा के भीतर जाकर किए गए सर्जिकल स्ट्राइक ने देशवासियों को यह भरोसा दिलाया है कि सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।

युद्ध समस्या का समाधान नहीं

यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स में मौजूदा हालात को लेकर रोष तो दिखा, लेकिन आवेश जरा भी नहीं। बेहद संयमित होकर युवाओं ने अपनी राय दी, जिसमें अहम यह था कि सरकार चाहे जिसकी भी हो, उसे ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए, जिसका दुष्परिणाम पूरे देश को झेलना पड़े। चुनावी मुद्दा बनाते वक्त राजनीति दलों को भी यह समझना होगा कि आतंकवाद का खात्मा केवल युद्ध से संभव नहीं है। बड़ी बात तो यह है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। यह आखिरी विकल्प होना चाहिए, न कि पहला। राजनीतिक दलों की भूमिका की भी वोटर्स जरूर समीक्षा करेंगे। तात्कालिक लाभ के लिए दिए गए बयान या फिर किए जाने वाले वायदों से अब युवा अवेयर रहता है। चर्चा के दौरान यह बात खुलकर कही गई कि केवल चुनावी घोषणा तक ही सुरक्षा का मुद्दा सीमित होकर न रह जाए, इसका वोटर्स जरूर खयाल रखेंगे। अभी भावनाएं चरम पर हैं। इस दौरान सरकार को सोच- समझकर कदम उठाना होगा। यही भविष्य की सरकारों को भी सोचना होगा। उनका एक गलत फैसला करोड़ों लोगों पर भारी पड़ सकता है।

मोरी बात

सरकार चाहे जिसकी भी हो, भारत वही है जो था। भारत हर तरह की परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम है और पूरा भरोसा है कि भारत की सरकार इस तरह के हमलों का मुंहतोड़ जवाब देगी। चूंकि, देश और देशवासियों के साथ- साथ जवानों की सुरक्षा की जवाबदेही सरकार पर होती है, इसलिए सरकार से अपेक्षाएं भी रहेंगी और उन अपेक्षाओं की आने वाले चुनाव से पूर्व समीक्षा भी होगी। वोटर्स इस बात से खुद को अलग नहीं कर पाएंगे कि देश आखिर किसके हाथों में ज्यादा सुरक्षित रहेगा। सोच- समझकर ही वोटिंग भी करेंगे, क्योंकि अन्य मुद्दों के साथ- साथ यह मुद्दा भी काफी गंभीर है।

ओम वर्मा

कड़क मुद्दा

हमारे जवानों की बात तभी होती है, जब उन्हें किसी आतंकी हमले में शहीद कर दिया जाता है। उनकी मौजूदा स्थिति बेहद खराब है। सरकारें आती हैं और चली जाती हैं। वोटर्स भी मंदिर- मस्जिद, बिजली- पानी जैसे मुद्दों पर खुद को केंद्रित रखते हैं। जो जितनी तेज आवाज में चीख सकता है, उसे वोट देना अपना धर्म समझते हैं। क्या कभी इस मुद्दे पर भी सरकार चुनी जाएगी कि हमारे जवानों को पूरी सुविधा मिले। जवानों को अत्यंत दुरूह परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। सुविधाएं कुछ भी नहीं मिलतीं। यहां तक कि जवानों की शहादत के बाद चार दिन देश भर में भावनाओं का ज्वार देखने को मिलता है, फिर सबकुछ चलता है वाले ट्रैक में आ जाता है। मृत जवानों की फैमिली के साथ कोई खड़ा नहीं रहता। इसे भी चुनावी मुद्दा बनाकर पार्टियां अगर आगे बढ़ें, तो युवा उनका साथ दे सकते हैं.

inextlive from Ranchi News Desk


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