सेक्सिस्ट विज्ञापन और टीवी शो का विरोध

2012-05-09T01:30:00+05:30

गुलाबी रंग के स्टूडियो में तंग कपड़े पहने कुछ आकर्षक दिखने वाली महिलाओं से जब कुछ सरल सवाल पूछे जाते हैं तो वो उनके सही जवाब नहीं दे पातीं

मसलन क्या धरती चांद के इर्द-गिर्द घूमती है? इस सवाल के जवाब में वो हां कहती हैं। इस बीच शो के असल प्रतियोगी, पूरे कपड़े पहने कुछ पुरुष ये अंदाजा लगाते हैं कि ये महिलाएं कौन से सवालों का गलत जवाब देंगी।

प्रतियोगिता का नाम है, "वुमेन्स लॉजिक" यानि "महिलाओं का तर्क", और जीतने के लिए पुरुषों को समझना है कि महिलाओं का तर्क आखिर है क्या। लेकिन अब इस शो का विरोध हो रहा है।

प्रदर्शनकारी निनिया काकाबाडजे कहती हैं, “शो में कहा गया है कि महिलाओं का तर्क पुरुषों के तर्क से अलग है। लेकिन तर्क का लिंग भेद से क्या संबंध । तर्क महिलाओं और पुरुषों में अलग नहीं होता। ये शो एक गलत मानसिकता को बढ़ावा दे रही है , कि एक खूबसूरत महिला जो अपना ध्यान रखे और जिसके अच्छे बाल हों वो बेवकूफ ही होगी, यानि सुदंर और समझदार होना मुमकिन ही नहीं है.”

'महिलाएं सामान नहीं'

शो के प्रोड्यूसर दातो इमेदशविली कहते हैं कि इस शो का मकसद सिर्फ मनोरंजन है, और कुछ नहीं। इमेदशविली कहते हैं, “अगर किसी को परेशानी है तो वो अपने रिमोट का इस्तेमाल करें और ना देखें। लेकिन लोग देख रहे हैं, हम तो एक ही सीजन बना रहे थे लेकिन अब और प्रोग्राम बना रहे हैं। हमें थोड़ा मुनाफा भी होगा, ये आदमियों के लिए है लेकिन महिलाएं भी शो का हिस्सा हैं, उन्हें सामान की तरह इस्तेमाल किए जाने के आरोप गलत हैं.”

लेकिन ये शो ही नहीं, कार का एक विज्ञापन भी विवादों में आ गया है। इसमें एक महिला का चेहरा दिखता है जिसपर लिप्स्टिक फैली हुई है, उसने अभी-अभी अपनी कार दुर्घटनाग्रस्त की है क्योंकि वो कार के शीशे को देख अपना मेक-अप कर रही थी। महिलाओं का कहना है कि पुरुषों से हुई दुर्घटनाओं की संख्या के बारे में कोई कुछ नहीं कहता और ऐसे विज्ञापनों के जरिए महिलाओं के बेकार ड्राइवर होने की मानसिकता को बढ़ावा दिया जाता है।

महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रही एक संस्था की सदस्य मरियम गागोशावेली के मुताबिक महिलाओं में आ रही ये तीखी प्रतिक्रिया एक नए दौर का संकेत लगती हैं। गागोशावेली कहती हैं, “ऐसे कई टीवी शो और विज्ञापन हैं और लगभग सभी कंपनियां अपने सामान बेचने के लिए महिलाओं की रूढ़ीवादी छवि दिखाती हैं। लेकिन अब लोगों को समझना होगा कि जब महिलाओं का मजाक उड़ाया जाए या बद्तमीजी की जाए तो वो इसे बर्दाश्त नहीं करेंगी, वो भी नाराज हो जाएंगी।
वैसे इंटरनेट की बदौलत कम समय में लोगों को सूचित कर विरोध प्रदर्शन आयोजित करना आसान हो गया है.”

क्या सोच बदलेगी?

जिस तरह से लिंग के आधार पर बनी रूढ़िवादी धारणाएं अब भी भारत के कई हिस्सों में प्रचलित हैं, वैसे ही पुरानी विचारधारा जॉर्जिया में अब भी मानी जाती हैं। पुरुष को परिवार का मुखिया और कमाने वाला जबकि महिला को परिवार की देखभाल करने की भूमिका में ही सही माना जाता है।

हालांकि असल जिन्दगी बदल रही है। हाल में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि जॉर्जिया के ज्यादा परिवारों में पुरुषों की जगह महिलाओं के वेतन पर घर चलता है। यानि परिस्थितियां बदली हैं और अब सोच को समय के साथ चाल मिलानी है।


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