साहब के पत्र लिखने के बाद भी नहीं बंद हुआ ब्रांड नेम लिखना

2019-04-19T06:01:08+05:30

-बीआरडी मेडिकल कॉलेज में मरीजों की जेब हो रही हल्की

- कमीशन के चक्कर में लिखी जा रही बाहर की दवाएं

-निर्देश भी बेअसर, मरीजों को नहीं दी जा रही जेनरिक दवाएं

GORAKHPUR: केस-1 गुलरिहा कस्बे की रहने वाली रीता देवी बीआरडी मेडिकल कॉलेज में स्कीन रोग विभाग में डॉक्टर से दिखाईं। वहां डॉक्टर ने दवा लिखीं। मेडिकल स्टोर वाले ने स्कीन दवा की जगह उन्हें उसी कॉंबिनेशन की दूसरी दवा दे दी। दूसरी दवा का दुकानदार ने 50 की जगह 150 रुपए कीमत ले ली। जब उन्होंने कहा कि कम कीमत की जगह महंगी वाली दवा क्यों दे रहे हैं। तो दुकानदार ने इधर-उधर की बात बतानी शुरू कर दी।

केस-2-कुशीनगर के रहने वाले रमेश प्रजापति मानसिक रूप से बीमार हैं। उन्होंने मानसिक रोग विभाग में डॉक्टर से दिखाया। डॉक्टर द्वारा लिखी दवा लेने के लिए वह मेडिकल स्टोर पर पहुंचे। चार दिन की दवा करीब 1000 रुपए में मिली। दवा खत्म होने के बाद वह अपने जानने वाले एक मेडिकल स्टोर पर पहुंचे। उसने उसी कॉबिनेशन की दूसरी दवा उन्हें दी। कहा कि यह भी उसी दवा की तरह काम करता है। लेकिन कमीशन के चक्कर में डॉक्टर ब्रांड नेम की दवा लिखते हैं।

ये दो केस दवाओं में कमीशनखोरी की हकीकत को जानने के लिए काफी हैं। यह खेल सिर्फ प्राइवेट हॉस्पिटलों में ही नहीं बल्कि सरकारी अस्पतालों में भी फलफूल रहा है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दवाओं में कमीशनखोरी की शिकायत से परेशान होकर एसआईसी ने सभी एचओडी से दवाएं लिखते समय ब्रांड का नाम फार्मालोजिकल लिखने की व्यवस्था करने को कहा है। इसे लेकर स्वास्थ्य महानिदेशालय काफी पहले आदेश दे चुका है। इसके बाद भी डॉक्टर कमीशनखोरी से बाज नहीं आ रहे हैं। जेनरिक दवाएं न लिखकर ब्रांडेड दवाएं लिखी जा रही हैं।

जेनरिक पर कम ब्रांड नेम पर ज्यादा जोर

सरकारी अस्पताल के बाहर मेडिकल स्टोर की भरमार है। जिला अस्पताल, महिला अस्पताल और बीआरडी मेडिकल कॉलेज में जेनरिक दवा की जगह ब्रांड नेम वाली दवा लिखने पर जोर ज्यादा दिया जाता है। इसलिए मेडिकल स्टोर वाले ब्रांड नेम दवाएं बेचने पर ज्यादा जोर देते हैं। इसकी मेन वजह यह भी है कि इन दवाओं पर ज्यादा मुनाफा होता है।

पत्र का नहीं दिख रहा असर

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नेहरू चिकित्सालय के एसआईसी ने विभिन्न विभागों के एचओडी को पत्र लिखकर पर्ची पर दवा लिखने के तरीकों में बदलाव लाने को कहा था। उन्होंने निर्देशित किया था कि डॉक्टर ब्रांड नेम न लिखकर दवा का फार्मालोजिकल नाम लिखें। जिससे मरीजों को दवा देने में आसानी हो सके। लेकिन सच तो यह है कि आज भी इस पत्र का असर नहीं दिख रहा है।

रोक बाद भी पहुंचते एमआर

सरकारी अस्पतालों में एमआर के प्रवेश पर रोक है लेकिन बीआरडी मेडिकल कॉलेज से लेकर अन्य सरकारी अस्पतालों में एमआर बेरोकटोट पहुंच रहे हैं। डॉक्टर से मिलकर अपनी कंपनी का ब्रांड दिखाकर उन्हें अच्छी कमीशन का हवाला देकर अपनी दवाओं का बेच रहे हैं लेकिन अस्पताल प्रशासन उनके खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रहा है।

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बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बेड की संख्या--950

ओपीडी मरीजों की संख्या

मेडिसिन विभाग 400-500

चर्म रोग 300-400

मानसिक रोग 300-350

आर्थो 350-400

सर्जरी 250-300

बाल रोग 400-500

स्त्री-प्रसूता रोग 300-400

टीबी व चेस्ट रोग विभाग 400-500

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वर्जन-

मरीजों की ओर से अक्सर शिकायत मिलती है। पत्र के माध्यम से एचओडी से कहते-कहते थक गए फिर भी वे अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे हैं। डॉक्टरों के ब्रांड नेम लिखने से कई बार दवा होने के बाद भी मरीजों को ये दवा नहीं मिल पाती है। ड्रग स्टोर में पर्याप्त मात्रा में दवाएं मौजूद हैं। यदि डॉक्टर फार्मालोजिकल नाम से दवा लिखें तो मरीजों को ज्यादा से ज्यादा दवाएं अस्पताल से ही मिल सकेंगी।

डॉ। गिरीश चंद्र श्रीवास्तव, एसआईसी बीआरडी मेडिकल कॉलेज

inextlive from Gorakhpur News Desk


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