प्रेगनेंसी के दौरान हाईबीपी और मोटापा खतरनाक

2019-03-24T06:00:54+05:30

- प्रेग्नेंसी के दौरान बढ़ जाता है हाई बीपी और मोटापे का खतरा

- लखनऊ आब्स एंड गाइनी सोसाइटी की ओर से नेशनल कांफ्रेंस जेस्टोसिस 2019 का आयोजन

LUCKNOW: प्रेग्नेंसी के दौरान कई बार महिलाओं को हाई बीपी की शिकायत होती है, लेकिन समय से जांच न कराने से इसका पता नहीं चल पाता। जेस्टेशनल डायबिटीज और मोटापे के कारण महिलाओं में दिक्कत बढ़ती है और बच्चे को ठीक से पोषण नहीं मिल पाता। डिलीवरी के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग से जच्चा-बच्चा दोनों को खतरा रहता है। तो कई बार मोटापा भी महिलाओं के लिए मुसीबत बनता है। ऐसे में महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान खास ख्याल रखना होगा। साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर में आयोजित लखनऊ आब्स एंड गाइनीकोलॉजी सोसाइटी की ओर से शनिवार को शुरू हुई दो दिवसीय नेशनल कांफ्रेंस जेस्टोसिस 2019 में गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं और इलाज के बारे में जानकारी दी गई। कार्यक्रम में देश विदेश की करीब 600 स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स ने हिस्सा लिया। कांफ्रेंस का शुभारंभ डॉ। राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज के निदेशक डॉ एके त्रिपाठी ने किया।

गर्भावस्था में हाई बीपी जानलेवा

मुंबई से आई प्रो। सुचित्र ने बताया कि प्रेग्नेंसी के दौरान वजन अगर अचानक बढ़ जाए तो पीठ और मांसपेशियों में तनाव रहता है। इससे दर्द, कमजोरी और थकावट महसूस होती है और डिलिवरी के दौरान परेशानी हो सकती है। ऐसे में बीपी की जांच कराएं। प्रत्येक महिला को हर माह एक बार बीपी की जांच जरुर करानी चाहिए। हाई बीपी होने पर छह घंटे में दोबारा चेक कराएं और अधिक मिलने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। उन्होंने बताया कि अगर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित नहीं किया गया तो बच्चे की ग्रोथ रुक जाती है। डिलीवरी के दौरान मरीज को झटके आने लगते हैं और जच्चा बच्चा दोनों को ही जान का खतरा रहता है। इसलिए नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराएं और दवा लें।

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पोस्ट पार्टम हेमरेज रोकने में कारगर है नई तकनीक : डॉ शांता कुमार

फॉग्सी की नेशनल कोऑर्डिनेटर हैदराबाद की डॉ। शांता कुमार ने बताया कि प्रेग्नेंसी में कई बार प्लेसेंट यूट्रस से जुड़ी रह जाती है जिससे लगातार ब्लीडिंग होने लगती है। यह गंभीर स्थिति होती हैं जिसमें कई बार यूट्रस को सर्जरी कर निकालना पड़ता है। इससे बचाव के लिए यूटेराइन आर्टरी इंबोलाइजेशन का प्रयोग करना चाहिए। जिसमें डिलीवरी के बाद यूट्रस के आसपास की नसों को बांध दिया जाता है जिससे ब्लीडिंग रुक जाती है।

इमरजेंसी में महत्वपूर्ण है पंप और प्रेशर तकनीक : डॉ। पुष्पलता शंखवार

केजीएमयू की डॉ। पुष्पलता शंखवार ने बताया कि महिलाएं कई बार गंभीर हालत में पहुंचती हैं। ऐसे में डॉक्टर्स को हर प्रकार से तैयार रहना चाहिए। इमरजेंसी में पंप एंड प्रेशर तकनीक महत्वपूर्ण है। जिसमें हमें मरीज को तुरंत ट्यूब, आईवी फ्ल्यूड, ऑक्सीजन से लेकर मॉनिटर भी लगाने पड़ते हैं। इमरजेंसी में ऑपरेट करने की व्यवस्था भी करनी पड़ती है।

नई तकनीक से रुकेगी ब्लीडिंग: डॉ। उर्मिला सिंह

केजीएमयू की प्रो। उर्मिला सिंह ने बताया कि पोस्ट पार्टम हेमरेज से बचने के लिए क्वीनमेरी अस्पताल में ही बैलून टैंपोनोड तकनीक इजाद की है। इसमें यूट्रेस में आईवी फ्लूड भर दिया जाता है। जिससे वॉल पर दबाव पड़ता है और ब्लीडिंग रुक जाती है। इसके अलावा कम्प्रेशन सूचर तकनीक भी है। कई बार ब्लीडिंग के कारण मरीज शॉक में चले जाते हैं इसके लिए मरीज को न्यूमेटिक एंटी शॉक गारमेंट में लपेट दिया जाता है जिससे ब्लड एकत्र होकर हार्ट, लिवर और किडनी में जाता है और किडनी हार्ट फेल हो से बच जाते हैं।

मोटापे की शिकार महिलाओं में होती है दिक्कत : डॉ। सुजाता देव

केजीएमयू की डॉ। सुजाता देव ने बताया कि कई बार नॉर्मल डिलीवरी के दौरान बच्चे का सिर तो बाहर आ जाता है, लेकिन कंधे से आगे का शरीर फंस जाता है। प्रो। सुजाता देव ने बताया कि इसे शोल्डर डिस्टोशिया कहते हैं। यह बेहद गंभीर समस्या होती है। इसे देखते हुए लेबर रूम में ही कई तरह की तकनीक अपनाई जाती है। उन्होंने बताया कि ऐसे में महिला पैरों को मोड़ देना चाहिए। इससे डिलीवरी में आसानी होगी। यह समस्या अधिकतर मोटापे की शिकार और डायबिटिक से पीडि़त महिलाओं में होती है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान ओबेसिटी और डायबिटीज का ध्यान रखें।

inextlive from Lucknow News Desk


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