माघ पूर्णिमा 2019 अंतिम स्नान आज नदी में एक डुबकी लगाने से प्रसन्न होते हैं भगवान विष्णु

2019-02-19T06:16:19+05:30

हिंदू पंचांग के अनुसार माघ पूर्णिमा की उत्पत्ति मघा नक्षत्र से होती है इसी महीने में देवता और पितृगण सदृश होते हैं। हिंदू मान्यता में पितृगणों की श्रेष्ठता की अवधारणा को बहुत महत्त्‍‌व दिया जाता है।

प्रयागराज में त्रिवेणी के संगम पर कुंभ महापर्व का संयोग और साथ ही माघ पूर्णिमा का पर्व असंख्य श्रद्धालुओं के लिए परम आनंद एवं उत्साह का विषय है। कुंभ के पावन अमृत-समागम से माघ पूर्णिमा स्नान की महिमा और भी बढ़ जाती है..ग्रंथों में त्रिवेणी पर लगे कुंभ की महिमा का गान इस प्रकार किया गया है -कुंभे गत्वा च पीत्वा च त्रिवेण्यां च युधिष्ठिर। सर्वपापविनर्मुक्ता: पुनाति सप्तमं कुलम्।। अर्थात् युधिष्ठिर कुंभ की त्रिवेणी में स्नान करके तथा उसका जलपान करके व्यक्ति अपनी 7 पीढि़यों का उद्धार करता है।

वहीं, ऋग्वेद में कहा गया है- यत्र गंगा च यमुना च यत्र प्राची सरस्वती। यत्र सोमेश्र्वरी देवस्तत्र माममृतं कृधींद्रायेन्दो परिस्त्रव।। अर्थात् हे सोम! जिस तीर्थ में गंगा, यमुना, सरस्वती और शिव विद्यमान हैं, वहां आप आकर अमृत प्रदान करें।वेदों के अतिरिक्त विभिन्न पुराणों में कुंभ के माहात्म्य की चर्चा एवं प्रमाण मिलते हैं। कुंभ का वर्तमान स्वरूप एक महासमन्वय का स्वरूप है, जहां विविध संप्रदायों के संत-महंतों, महामंडलेश्वरों व विज्ञ महापुरुषों के विचार मंथन से उद्भूत अमृत जन-सामान्य को अमृत्व प्रदान करता है। पतित पावनी मां त्रिवेणी के संगम पर कुंभ महापर्व का संयोग और साथ ही माघ पूर्णिमा का पर्व असंख्य श्रद्धालुओं के लिए परम आनंद एवं उत्साह का विषय है। यहां प्रयाग में एक अद्भुत एवं आध्यात्मिकता से ओतप्रोत वातावरण व्याप्त है। इस क्षेत्र से उठी ऊर्जा समस्त विश्व को शांति और सौभाग्य का संदेश दे रही है।

हिंदू धर्म के सभी उत्सव लौकिक आनंद के साथ-साथ मानव के चरित्र को आवश्यक निधियों की ओर प्रवृत्त और निषिद्ध से निवृत्त कर एक ऐसे अनुशासन में निबद्ध करते हैं, जिससे मानव इहलौकिक और पारलौकिक अभ्युदय प्राप्त करता है। उसे शारीरिक शुद्धि एवं स्वास्थ्य के साथ-साथ आत्मिक उन्नयन सहज प्राप्त होता है। निर्णयसिन्धु ग्रंथ में उल्लिखित है कि माघ महीने के दौरान मनुष्य को कम-से-कम एक बार किसी पवित्र नदी, विशेषकर गंगा में स्नान अवश्य करना चाहिए। क्योंकि, भले पूरे माह स्नान के योग न बन सकें, लेकिन माघ पूर्णिमा के स्नान से स्वर्गलोक का उत्तराधिकारी बना जा सकता है। इस बात का उदाहरण इस श्लोक से मिलता है : मासपर्यन्त Fानासम्भवे तु त्रयहमेकाहं वा Fायात्। अर्थात् 'जो लोग लंबे समय तक स्वर्गलोक का आनंद लेना चाहते हैं, उन्हें माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर अवश्य नदी-स्नान करना चाहिए।

ये वस्तुएं दान करें

हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ पूर्णिमा की उत्पत्ति मघा नक्षत्र से होती है, इसी महीने में देवता और पितृगण सदृश होते हैं। हिंदू मान्यता में पितृगणों की श्रेष्ठता की अवधारणा को बहुत महत्त्‍‌व दिया जाता है। इस दिन पितरों के लिए तर्पण भी हजारों साल से चला आ रहा है। पुराणों में वर्णित है कि इस दिवस को स्वर्ण, तिल, कंबल, पुस्तकें, पंचांग, कपास के वस्त्र और अन्नादि दान करने से मनुष्य महाभागी बनता है।

इस दिन भगवान विष्णु को ऐसे करें प्रसन्न

कहते हैं भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए इस दिन बस नदी में सच्चे मन से डुबकी लगाना ही काफी होता है। इलाहाबाद में संगम तट पर पौष पूर्णिमा से शुरू होने वाले माघ के स्नान एक महीने बाद माघी पूर्णिमा पर समाप्त हो जाते हैं। कल्पवास के बाद माघ का अंतिम स्नान इस पूर्णिमा के दिन ही होता है। इस दिन किए गए यज्ञ, तप और दान का विशेष महत्व बताया जाता है। माघ मास की पूर्णिमा पर भगवान विष्णु की खास पूजा होती है। भोजन, वस्त्र, गुड़, कपास, घी, लड्डू, फल, अन्न आदि का दान करना पुण्यदायक माना जाता है। माघ पूर्णिमा में सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी या घर पर ही स्नान करके भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए।

स्नान का खास महत्व

माघ मास में काले तिलों से हवन और पितरों का तर्पण करने का और तिल के दान का भी विधान है। मान्यता है कि सभी देवता माघ मास में कुंभ स्नान के लिए पृथ्वी पर आते हैं। मानव रूप में वे पूरे मास भजन-कीर्तन करते हैं और यह देवताओं के स्नान का अंतिम दिन होता है। एक मान्यता यह भी है कि द्वापर युग में दानवीर कर्ण को माता कुंती ने माघी पूर्णिमा के दिन ही जन्म दिया था। इसी दिन कुंती ने उन्हें नदी में प्रवाहित किया था। इसी से मान्यता है कि इस दिन गंगा, यमुना सहित अन्य धार्मिक तीर्थ स्थलों पर स्नान करने से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

माघ मास की पूर्णिमा के दिन को पुराणों में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है। इलाहाबाद में संगम तट पर पौष पूर्णिमा से शुरू होने वाले माघ के स्नान एक महीने बाद आज के दिन माघी पूर्णिमा पर समाप्त हो जाते हैं। कल्पवास के बाद माघ का अंतिम स्नान पूर्णिमा के दिन ही होता है। प्रयागराज संगम में आगमन और त्रिवेणी मैं डुबकी लगाना न केवल आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करता है, बल्कि अपने जीवन की सार्थकता की उपलब्धि भी होती है।

— डॉ. पूर्णिमा अग्रवाल, आध्यात्मिक लेखिका, चिंतक एवं विचारक

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