बद्रीनाथ कैसे बना लक्ष्मीनारायण का धाम जानें यह रोचक घटनाक्रम

2018-06-06T12:23:03+05:30

हिमालय की खूबसूरत वादियों में बसे पवित्र तीर्थस्थल बद्रीनाथ को नारायण का घर माना जाता है। इसी वजह से प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं तो फिर आप भी चले इस पावन देवभूमि के दर्शन करने।

 

संध्या टंडन। हिमालय की खूबसूरत वादियों में बसे पवित्र तीर्थस्थल बद्रीनाथ को नारायण का घर माना जाता है। इसी वजह से प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं तो फिर आप भी चले इस पावन देवभूमि के दर्शन करने। गर्मियों के मौसम में अगर सपरिवार तीर्थयात्रा की इच्छा हो तो इस दृष्टि से बद्रीनाथ अनुकूल दर्शनीय स्थल है। उत्तराखंड राज्य में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित यह मंदिर, भगवान विष्णु के बद्रीनाथ स्वरूप को समर्पित है।
प्रचलित कथा एक प्रचलित कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो हिमपात होने लगा। ऐसे में उनकी रक्षा के लिए माता लक्ष्मी ने बेर के वृक्ष का रूप धारण कर लिया। जब तपस्या पूर्ण हो गई तो उन्होंने देखा कि लक्ष्मी जी बर्फ से ढक गई हैं। उन्हें देखकर भगवान ने कहा कि तुमने भी मेरे बराबर तप किया है तो इस धाम में मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा की जाएगी। चूंकि तुमने बद्रिका वृक्ष (बेर का पेड़) बनकर मेरी रक्षा की है, इसलिए आज से मुझे बद्रीनाथ के नाम से जाना जाएगा। जहां भगवान ने तप किया था, वह पवित्र स्थल तप्त-कुंड के नाम से विख्यात है। उनके तप के प्रभाव से उस कुंड का पानी हमेशा गर्म रहता है।
मंदिर से जुड़ी मान्यताएं अलकनंदा के दाएं तट पर नारायण का 45 फीट ऊंचा मंदिर है, जिसके शीर्ष पर स्वर्ण-कलश स्थापित है। मंदिर के भीतर नारायण पद्मासन में बैठे हैं, उनके दोनों हाथ योगमुद्रा में हैं। उनकी मूर्ति काले शालिग्राम पत्थर से बनी है, जो लगभग तीन फीट ऊंची है। दायीं ओर नर और नारायण की मूर्तियां हैं। बायीं तरफ गरुड़ और कुबेर विराजमान हैं।
मंदिर में नर-नारायण विग्रह (मूर्ति) की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है। यहां तुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, सूखे नारियल और मिश्री का प्रसाद चढ़ाया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार बद्रीनाथ भारत का सबसे प्राचीन तीर्थ है। यहां वर्तमान दौर में जो मंदिर मौज़ूद है, उसे रामानुजाचार्य संप्रदाय के स्वामी वरदराज की प्रेरणा से गढ़वाल नरेश ने पंद्रहवीं शताब्दी में बनवाया था। इस पर सोने का छत्र और कलश इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने चढ़वाया था। हिमालय के करीब होने के कारण यहां बहुत ब$र्फ  गिरती है।अत: भक्तों के लिए इसके कपाट अप्रैल में खुलते हैं और सर्दियां आने से पहले ही उन्हें बंद कर दिया जाता है।  
प्रचलित परंपरा वसंत पंचमी के दिन टिहरी के राजा की उपस्थिति में मंदिर का कपाट खुलने का मुहूर्त निकाला जाता है। महारानी और कुंवारी कन्याएं तिल का तेल निकालकर उसे एक सुसज्जित घड़े में रखती हैं। पट खुलने के 16 दिन पहले कलश की शोभायात्रा निकाली जाती है। मंदिर खुलने के बाद इसी तेल से बद्रीनाथ का अभिषेक किया जाता है। यहां धार्मिक अनुष्ठानों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक चबूतरा है, जिसे ब्रह्म कपाल कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां श्राद्ध करने से पितरों को मुक्ति मिल जाती है। यहां चरण-पादुका नामक स्थल भी है, जहां भगवान विष्णु के चरण-चिह्न भी नज़र आते हैं। वेद व्यास और गणेश गुफा भी दर्शनीय है। ऐसी मान्यता है कि वेदों और उपनिषदों की रचना इसी गुफा में हुई थी। यहां माणा गांव है, जिसे भारत का अंतिम गांव कहा जाता है। यहां स्वर्गारोहिणी नामक स्थल भी प्रसिद्ध है, ऐसी मान्यता है कि यहीं से युधिष्ठिर ने स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया था।   सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में बसा यह तीर्थ दर्शनीय है। यहां जाने के लिए दिल्ली, बरेली लखनऊ, चंडीगढ़, नैनीताल और काठगोदाम  जैसे शहरों से सीधी बस सेवा उपलब्ध है। यहां ठहरने के लिए गढ़वाल विकास मंडल के आरामदेह गेस्ट हाउस और कई धर्मशालाएं मौज़ूद हैं। बद्रीनाथ जाने के लिए यही मौसम ठीक रहता है तो फिर देर किस बात की, आप भी निकले पड़ेंदर्शन करने।
साभार सखी संध्या टंडन। हिमालय की खूबसूरत वादियों में बसे पवित्र तीर्थस्थल बद्रीनाथ को नारायण का घर माना जाता है। इसी वजह से प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं तो फिर आप भी चले इस पावन देवभूमि के दर्शन करने। गर्मियों के मौसम में अगर सपरिवार तीर्थयात्रा की इच्छा हो तो इस दृष्टि से बद्रीनाथ अनुकूल दर्शनीय स्थल है। उत्तराखंड राज्य में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित यह मंदिर, भगवान विष्णु के बद्रीनाथ स्वरूप को समर्पित है।

प्रचलित कथा

एक प्रचलित कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो हिमपात होने लगा। ऐसे में उनकी रक्षा के लिए माता लक्ष्मी ने बेर के वृक्ष का रूप धारण कर लिया। जब तपस्या पूर्ण हो गई तो उन्होंने देखा कि लक्ष्मी जी बर्फ से ढक गई हैं। उन्हें देखकर भगवान ने कहा कि तुमने भी मेरे बराबर तप किया है तो इस धाम में मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा की जाएगी। चूंकि तुमने बद्रिका वृक्ष (बेर का पेड़) बनकर मेरी रक्षा की है, इसलिए आज से मुझे बद्रीनाथ के नाम से जाना जाएगा। जहां भगवान ने तप किया था, वह पवित्र स्थल तप्त-कुंड के नाम से विख्यात है। उनके तप के प्रभाव से उस कुंड का पानी हमेशा गर्म रहता है।

मंदिर से जुड़ी मान्यताएं

अलकनंदा के दाएं तट पर नारायण का 45 फीट ऊंचा मंदिर है, जिसके शीर्ष पर स्वर्ण-कलश स्थापित है। मंदिर के भीतर नारायण पद्मासन में बैठे हैं, उनके दोनों हाथ योगमुद्रा में हैं। उनकी मूर्ति काले शालिग्राम पत्थर से बनी है, जो लगभग तीन फीट ऊंची है। दायीं ओर नर और नारायण की मूर्तियां हैं। बायीं तरफ गरुड़ और कुबेर विराजमान हैं।

मंदिर में नर-नारायण विग्रह (मूर्ति) की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है। यहां तुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, सूखे नारियल और मिश्री का प्रसाद चढ़ाया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार बद्रीनाथ भारत का सबसे प्राचीन तीर्थ है। यहां वर्तमान दौर में जो मंदिर मौज़ूद है, उसे रामानुजाचार्य संप्रदाय के स्वामी वरदराज की प्रेरणा से गढ़वाल नरेश ने पंद्रहवीं शताब्दी में बनवाया था। इस पर सोने का छत्र और कलश इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने चढ़वाया था। हिमालय के करीब होने के कारण यहां बहुत ब$र्फ  गिरती है।अत: भक्तों के लिए इसके कपाट अप्रैल में खुलते हैं और सर्दियां आने से पहले ही उन्हें बंद कर दिया जाता है।

प्रचलित परंपरा

वसंत पंचमी के दिन टिहरी के राजा की उपस्थिति में मंदिर का कपाट खुलने का मुहूर्त निकाला जाता है। महारानी और कुंवारी कन्याएं तिल का तेल निकालकर उसे एक सुसज्जित घड़े में रखती हैं। पट खुलने के 16 दिन पहले कलश की शोभायात्रा निकाली जाती है। मंदिर खुलने के बाद इसी तेल से बद्रीनाथ का अभिषेक किया जाता है। यहां धार्मिक अनुष्ठानों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक चबूतरा है, जिसे ब्रह्म कपाल कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां श्राद्ध करने से पितरों को मुक्ति मिल जाती है। यहां चरण-पादुका नामक स्थल भी है, जहां भगवान विष्णु के चरण-चिह्न भी नज़र आते हैं। वेद व्यास और गणेश गुफा भी दर्शनीय है। ऐसी मान्यता है कि वेदों और उपनिषदों की रचना इसी गुफा में हुई थी। यहां माणा गांव है, जिसे भारत का अंतिम गांव कहा जाता है। यहां स्वर्गारोहिणी नामक स्थल भी प्रसिद्ध है, ऐसी मान्यता है कि यहीं से युधिष्ठिर ने स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया था। 

सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में बसा यह तीर्थ दर्शनीय है। यहां जाने के लिए दिल्ली, बरेली लखनऊ, चंडीगढ़, नैनीताल और काठगोदाम  जैसे शहरों से सीधी बस सेवा उपलब्ध है। यहां ठहरने के लिए गढ़वाल विकास मंडल के आरामदेह गेस्ट हाउस और कई धर्मशालाएं मौज़ूद हैं। बद्रीनाथ जाने के लिए यही मौसम ठीक रहता है तो फिर देर किस बात की, आप भी निकले पड़ेंदर्शन करने।

 

साभार सखी


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