योगबल से हुआ था श्रीकृष्ण का जन्म जानें मुकुट पर लगे मोरपंख का रहस्य

2018-09-03T10:10:15+05:30

श्रीकृष्ण जैसे आदि देवता बाल्यावस्था से ही महात्मा थे; इसीलिए उनके बाल्यावस्था के चित्रों में भी उनको प्रभामंडल से सुशोभित दिखाया जाता है। यही वजह है कि श्रीकृष्ण की किशोरावस्था को भी मातायें बहुत याद करती हैं और ईश्वर से मन ही मन यही प्रार्थना करती हैं कि यदि हमें बच्चा हो तो श्रीकृष्ण जैसा।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि श्रीकृष्ण भारतीयों के रोम-रोम में बसे हुए हैं, और इसीलिए उनके जन्मोत्सव अर्थात 'जन्माष्टमी’ को भारत के हर नगर में बहुत ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। श्रीकृष्ण सभी को इसलिए इतने प्रिय लगते हैं क्योंकि उनकी सतोगुणी काया, सौम्य चितवन, हर्षितमुख और उनका शीतल स्वभाव सबके मन को मोहने वाला है और इसीलिए उनके जन्म, किशोरावस्था और बाद के भी सारे जीवन को लोग दैवीय जीवन मानते हैं। परंतु फिर भी श्रीकृष्ण के जीवन में जो मुख्य विशेषताएं थीं, उसको लोग आज यथार्थ रूप में और स्पष्ट रीति से नहीं जानते।

श्रीकृष्ण दर्शन के लिए उनके रहस्यों को जानना जरूरी

उदाहरण के तौर पर वे यह नहीं जानते कि श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व इतना आकर्षक क्यों था और वे पूज्य श्रेणी में क्यों गिने जाते हैं? पुनश्च, उन्हें यह भी ज्ञात नहीं है कि श्रीकृष्ण ने उस उत्तम पद्वी को किस उत्तम पुरुषार्थ से पाया। अत: जब तक हम उन रहस्यों को पूर्णत: जानेंगे नहीं, तब तक श्रीकृष्ण दर्शन जैसे हमारे लिए अधूरा ही रह जाएगा। श्रीकृष्ण जैसे आदि देवता बाल्यावस्था से ही महात्मा थे; इसीलिए उनके बाल्यावस्था के चित्रों में भी उनको प्रभामंडल से सुशोभित दिखाया जाता है। यही वजह है कि श्रीकृष्ण की किशोरावस्था को भी मातायें बहुत याद करती हैं और ईश्वर से मन ही मन यही प्रार्थना करती हैं कि यदि हमें बच्चा हो तो श्रीकृष्ण जैसा। उनमें तथा अन्य किशोरों में यही तो अंतर है कि उनकी काया सतोप्रधान तत्वों की बनी हुई थी, वे पूर्ण पवित्र संस्कारों वाले थे और उनका जन्म योगबल द्वारा हुआ था।

मुकुट पर लगे मोर-पंख का रहस्य


उनके मुकुट पर लगा हुआ मोर-पंख इसी रहस्य का प्रतीक है कि वे पूर्ण पवित्र थे और उनका जन्म काम-वासना के भोग से नहीं हुआ था। वास्तव में श्रीकृष्ण का मोर मुकुट कई बातों का प्रतिनिधित्व करता है एवं कई तरह के संकेत हमारे जीवन में लाता है। यदि इसे ठीक से समझा जाए तो कृष्ण का मोर-मुकुट ही हमें जीवन की कई सच्चाइयों से अवगत कराता है। इसके अतिरिक्त प्रभामंडल भी निर्विकारिता का सूचक है। 'श्री’ की उपाधि से भी सिद्ध होता है कि कृष्ण पूर्ण पवित्र थे। आज तो 'श्री’ शब्द का रस्मी तौर पर मिस्टर शब्द के स्थान पर प्रयोग किया जाता है, परंतु वास्तव में 'श्री’ शब्द केवल देवताओं के नाम के आगे प्रयोग हो सकता है क्योंकि उनका जीवन पवित्र होता है।

जरा सोचिए जबकि श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति करने वाले नर-नारी भी कामविकार को छोड़कर ब्रह्मचर्य व्रत धारण करते हैं तो स्वयं श्रीकृष्ण का जन्म इस विकार से कैसे हुआ होगा? मीराबाई ने तो श्रीकृष्ण की भक्ति के कारण आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया और इसके लिए विष का प्याला भी पीना सहर्ष स्वीकार कर लिया, जबकि श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए उनका क्षणिक साक्षात्कार मात्र करने के लिए और उनसे कुछ मिनट रास रचाने के लिए भी काम-विकार का पूर्ण बहिष्कार जरूरी है।

पूर्णत: पवित्र था श्रीकृष्ण का जीवन


आज जबकि श्रीकृष्ण के मंदिर में जाकर लोग उनकी जड़ मूर्तियों के सम्मुख भी काम विकार का संकल्प करना महान पाप समझते हैं तो श्रीकृष्ण की चैतन्य रूप की उपस्थिति में इस भारत रूपी वृहद मंदिर में काम और कामी कैसे उपस्थित हो सकते हैं? अत: यह सिद्ध है कि उनका जीवन पूर्णत: पवित्र था और इस कारण से ही यह वाक्य प्रचलित है कि 'जहां श्याम हैं, वहां काम नहीं और जहां काम है, वहां श्याम नहीं.’

राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी

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