उस समय एंटी कांग्रेस चेहरा थे ज्योति बसु इस छोटी सी वजह से पीएम बनतेबनते रह गए

2018-07-08T08:02:01+05:30

मार्क्‍सवादी नेता ज्योति बसु बेशक आज इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनके होने का अहसास होता है। ज्योति बसु 1996 में देश में एंटी कांग्रेस का वो चेहरा थे जिन्हें लोग पीएम पद पर देखना चाहते थे लेकिन कुछ कारणों से नहीं बन पाए थे। आइए जानें 8 जुलाई को जन्में इस राजनेता के बारे में

ज्योति बसु का बचपन कोलकाता में बीता
कानपुर। ज्योति बसु का जन्म 8 जुलाई 1914 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता निशिकांत बसु और मां हेमलता देवी कोलकाता में रहते थे, हालांकि उनके पूर्वजों का घर ढाका में बारदी गांव में था। निशिकांत बसु एक प्रतिष्ठित होम्योपैथ डॉक्टर थे। ज्योति बसु का बचपन कोलकाता में बीता। ज्योति बसु ने सेंट जेवियर्स स्कूल से  इंटरमीडिएट करने के बाद अंग्रेजी में ऑनर्स के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज में एडमीशन लिया था। हालांकि बसु का परिवार राजनीति में नहीं था लेकिन इनके पिता राष्ट्रीय संघर्ष का समर्थन करते थे।वहीं बसु स्कूल में रहते हुए, 1930 में सूर्य सेन के नेतृत्व में चटगांव के सशस्त्र विद्रोह से प्रेरित थे।

बसु कानूनी पढ़ाई करने इंग्लैंड गए थे

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की आधकारिक वेबसाइट के मुताबिक 1935 में, बसु कानूनी पढ़ाई करने इंग्लैंड गए।बसु लंदन माजलिस के पहले सचिव बने, जो भारतीयों का एक संघ था। बसु ने भारत लौटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने का फैसला लिया। बसु 1940 में भारत लौटे और तुरंत पार्टी के नेताओं से संपर्क किया। वहीं उन्होंने खुद को कलकत्ता उच्च न्यायालय में बैरिस्टर के रूप में नामांकित किया, लेकिन उन्होंने कभी भी अभ्यास नहीं किया। इसके साथ ही बसु कोलकाता में सोवियत संघ के मित्र और एंटी-फासिस्ट राइटर्स एसोसिएशन के सचिव बने।उन्हें 1944 से ट्रेड यूनियन फ्रंट में जिम्मेदारियां सौंपी गईं।
बरनगर से विधानसभा के लिए चुने गए
बसु 1946 में रेलवे श्रमिक निर्वाचन क्षेत्र से बंगाल प्रांतीय असेंबली के लिए चुने गए। वह 1952 में बरनगर से विधानसभा के लिए चुने गए थे। इसके बाद वह राजनीति में तेजी से बढ़ने लगे। जब कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर वैचारिक संघर्ष के परिणामस्वरूप 1964 में सीपीआई (एम) का गठन हुआ, तो बसु राजनीति ब्यूरो के सदस्य बने। भारत-चीन सीमा संघर्ष के दिनों बसु पर चीन के एजेंट  होने का आरोप लगा था। सन् 1967 भारत में कांग्रेसी शासन के खिलाफ जनता का मोहभंग और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की पराजय हुई। इस दौरान जिस पहली गैर-कांग्रेसी संयुक्त मोर्चे की सरकार का गठन हुआ, बसु उसमें उपमुख्यमंत्री चुने गए थे।
राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
हालांकि यह सरकार अधिक दिनों तक नहीं चल पाई। ऐसे में 1969 में हुए चुनाव में वह फिर से मुख्यमंत्री हुए। इस दौरान उन्होंने राज्य में भूमिसुधार के लिए किसानों के आंदोलनों और मजदूरी में वृद्धि के प्रयास किए।1970  में पटना रेलवे स्टेशन पर ज्योति बसु पर जानलेवा हमला हुआ। हालांकि इसमें वह  बच गए थे। 1971 में, बसु की कार और सार्वजनिक बैठक पर कांग्रेस समर्थकों ने  दो बार हमला किया था। वहीं 1971 में विधानसभा चुनावों में सीपीआई (एम) सिंगल लारजेस्ट पार्टी बनकर सामने आई थी।63 साल की उम्र में 1977 में बसु मुख्यमंत्री बने। ज्योति बसु ने राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2010 में वह दुनिया को अलविदा कह गए
इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरसिम्हा राव के शासनकाल में बसु ने कांग्रेस विरोधी धर्मनिरपेक्ष विपक्षी सेनाओं को संगठित करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।1996 में, पीएम पद के उनका नाम प्रस्तावित हुआ था। उस समय यही कांग्रेस के खिलाफ एक शसक्त चेहरा थे, लेकिन सीपीआई (एम) केंद्रीय समिति ने सरकार से बाहर का समर्थन करने का फैसला किया।नवंबर 2000 में, बसु स्वेच्छा से सीएम पर से सेवानिवृत्त हुए लेकिन उन्होंने पार्टी का नेतृत्व जारी रखा। खास बात तो यह है कि लगातार 24 वर्षों तक सीएम रहे बसु सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री थे। साल 2010 में वह दुनिया को अलविदा कह गए थे।

 


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