प्रेम ही इंसान को परमात्मा तक ले जाता है

2018-12-19T03:57:30+05:30

किसी से आंख मिली और बात हो गई। बात हुई ही नहीं और बात’ हो गईऔर तुम सदा के लिए बंध गए। इसको तुम कर्तृत्व कहते हो? तुमने किया क्या? प्रेम होता है किया नहीं जाता

प्रश्न: आपने कहा कि संसार में सफल अभिनेता बनो, तो फिर प्रेम में अभिनय कैसे हो?

प्रेम में तो सबसे सुगम है। तुम्हारी अड़चन मैं समझ रहा हूं। तुम सोच रहे हो कि प्रेम में अभिनय किया, तो प्रेम झूठा हो जाएगा तुम मेरी बात चूक गए। बात थोड़ी सूक्ष्म है। अगर प्रेम में भी अभिनय किया, तो झूठा हो जाएगा, तो झूठे प्रेम का क्या मूल्य होगा? दूसरी तरफ से देखो, मेरी तरफ से देखो। जब मैंने कहा: जीवन पूरा अभिनय हो जाए, तो यह तो प्रेम पर सबसे ज्यादा लागू होता क्योंकि प्रेम में कभी कोई कर्ता हो ही नहीं पाया है इसलिए तो प्रेम परमात्मा के बहुत निकट है, प्रार्थना के बहुत निकट है। तुमने प्रेम किया है? या प्रेम हुआ है? -इस पर सोचना। इसे जरा ध्यान देना। तुम्हारा किसी से प्रेम का नाता बना- यह तुमने किया है या हुआ है? करना क्या है इसमें? तुमने किया क्या? तुमने कुछ चेष्टा की? अभ्यास किया? योगासन साधे? तुमने किया क्या? कोई दिखाई पड़ा; किसी को देखा, और अचानक एक प्रेम की लहर दौड़ गई। किसी से आंख मिली और बात हो गई। क्षण भर पहले तक प्रेम का ख्याल ही न था। प्रेम की तुम सोच भी न रहे थे। प्रेम की कोई बात ही न थी।

किसी से आंख मिली और बात हो गई। बात हुई ही नहीं और 'बात’ हो गई--और तुम सदा के लिए बंध गए। इसको तुम कर्तृत्व कहते हो? तुमने किया क्या? प्रेम होता है- किया नहीं जाता इसलिए मैं कहता हूं कि प्रेम में अगर कर्ताभाव बना रहे हो, तब तो तुमने हद्द कर दी। वहां तो कर्ता है ही नहीं इसलिए तो ज्ञानियों ने कहा: प्रेम ही परमात्मा तक ले जाता है प्रेम को ही समझ लो कि तुम जीवन की बड़ी गहरी बात समझ गए। प्रेम किसने किया है? कभी किसी ने नहीं किया है। सब होता है और होता है, तो फिर कैसे कर्ता? फिर तो अकर्ता का भाव अपने आप गहरा हो जाएगा। उसी अकर्ता में अभिनय है। तो जब मैं तुमसे कहता हूं: अभिनय समझो, तो तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि अभिनय 'करो’। तुमसे यह कह रहा हूं कि समझोगे, तो कर्ता विसर्जित हो जाएगा; जो रह जाएगा, वह अभिनय-मात्र है।

परमात्मा ने प्रेम करवा दिया, तो प्रेम हो गया। नहीं तो तुम्हारे वश में क्या था? तुम कोशिश करके सफल हो सकोगे? अगर मैं कहूं कि इस व्यक्ति को प्रेम करो। तुम क्या करोगे? तुम कहोगे: होता ही नहीं, तो क्या करें? हो सकता है; इसे तुम गले लगा लो, मगर गले लगाने में तो प्रेम नहीं है। तुम जल्दी में होओगे कि कब इससे छुटकारा हो! तुमसे अगर कहा जाए: प्रेम करो, तो तुम क्या करोगे? तुम कुछ भी न कर पाओगे इसलिए तो दुनिया में प्रेम झूठा हो गया है मतलब?

बचपन से तुम्हें समझाया गया है कि प्रेम करो, और प्रेम किया नहीं जा सकता। तो तुम 'करना’ सीख गए हो। मां कहती है: प्रेम करो, क्योंकि मैं तुम्हारी मां हूं। अब मां होने से क्या प्रेम का लेना-देना? पिता कहता है: मुझसे प्रेम करो, क्योंकि मैं तुम्हारा पिता हूं। यह छोटे से बच्चे से हम जो आशाएं रख रहे हैं, ये आशाएं बड़ी भयंकर हैं। यह छोटा बच्चा क्या करे? पिता हैं आप, ठीक है लेकिन इसे प्रेम हो तो हो; और नहीं हो रहा है, तो यह क्या करे? पिता का हाथ पकड़ लो; मां की साड़ी पकड़ लो। मां का पल्लू पकड़कर घूमते रहो। मां बड़ी खुश होती है। खुश होती है, तो लाभ है, सुरक्षा है। ऐसे प्रेम शुरू से ही झूठ होने लगा। फिर एक दिन तुम्हारा विवाह हो जाएगा और तुमसे कहा जाएगा: यह तुम्हारी पत्नी है, यह तुम्हारा पति है, अब इसको प्रेम करो।

प्रेम कैसे करोगे? प्रेम को झुठला दिया गया है। प्रेम किया ही नहीं जा सकता। हो जाए, तो हो जाए। यह आकाश से उतरता है। यह किन्हीं अनजान रास्तों से आता है और प्राणों को घेर लेता है। यह हवा के झोंके की तरह आता है। देखते हैं: वृक्ष हिलते हैं; हवा का झोंका आ गया। नहीं आएगा, तो नहीं हिलेंगे। ऐसा ही प्रेम है। प्रेम तुम्हारे हाथ में नहीं; प्रेम तुम्हारे बस में नहीं; प्रेम तुम्हारी मुट्ठी में नहीं है। तुम प्रेम की मुट्ठी में हो। यह समर्पण का अर्थ होता है। तो प्रेम तो सबसे ज्यादा निकट बात है प्रार्थना के इसलिए प्रेम को अगर तुमने समझ लिया, तो तुम पाओगे: तुम्हारा किया कुछ भी नहीं; परमात्मा करवा रहा है। यही मेरा अर्थ है--अभिनय से। अभिनय से मेरा अर्थ नहीं है कि तुम कुछ कर रहे हो। तुमने कुछ किया, तो झूठ हो जाएगा। तुमने यह जाना कि मैं करने वाला नहीं हूं; कराने वाला और करने वाला 'वही’ है; मैं सिर्फ उपकरणमात्र, उसके हाथ की कठपुतली। 'मुक्तिमूल आधीनता...’

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