माघी पूर्णिमा 2019 इस बार बन रहा है दुर्लभ शोभन योग गंगा स्नान का है विशेष महत्व

2019-02-18T11:18:38+05:30

पूर्णिमा सोमवार 18 फरवरी को रात्रि 11 बजकर 50 मिनट से लग जाएगी जो मंगलवार 19 फरवरी को रात्रि 9 बजकर 56 मिनट तक रहेगी।

शास्त्रों में माघ-स्नान व्रत की बड़ी महिमा बताई गई है। वैसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा को विशेष महत्व दिया गया है। जो इस वर्ष मंगलवार 19 फरवरी को पड़ रही है।

तिथि​

पूर्णिमा सोमवार 18 फरवरी को रात्रि 11 बजकर 50 मिनट से लग जाएगी, जो मंगलवार 19 फरवरी को रात्रि 9 बजकर 56 मिनट तक रहेगी।

माघ पूर्णिमा को शोभन योग

माघ शुक्ल पूर्णिमा के दिन शोभनयोग दिन में 11:38 तक रहेगा, जो दुर्लभ संयोग बना रहा है। शोभन योग- जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, इस योग में जो शुभ कृत्य किया जाता है, उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैलती है। उसका प्रचार स्वतः हो जाता है।

पूर्णिमा स्नान का महत्व

माघ मास की पूर्णिमा तीर्थस्थलों में स्नान-दानादि के लिए परम फल देने वाली बताई गई है। तीर्थराज प्रयाग में इस दिन स्नान, दान, गोदान एवं यज्ञ का विशेष महत्व है।

धार्मिक कार्यो के सम्पन्न करने की विधि

माघी पूर्णिमा को कुछ धार्मिक कार्यो के सम्पन्न करने की विधि शास्त्रों में दी गई है। वह इस प्रकार है-

प्रातः काल नित्य कर्म एवं स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान् विष्णु का विधिपूर्वक पूजन करें। फिर पितरों का श्राद्ध करें। असमर्थों को भोजन, वस्त्र तथा आश्रय दें। तिल, कम्बल, कपास, गुड़, घी, मोदक, जूते, फल, अन्न और यथा शक्ति सुवर्ण, रजत, आदि का दान दें। पूरे दिन का व्रत रखकर ब्राह्मणों को भोजन दें। सत्संग एवं कथा—कीर्तन में दिन-रात बिताकर दूसरे दिन पारण करें।

ये प्रभाव

इसके अलावा पूर्णिमा के दिन बुधादित्ययोग, केन्द्रस्थ गुरु, स्वगृही मंगल के होने से देश में उल्लास का वातावरण बनेगा। सूर्य पर शनि की दृष्टि श्रेष्ठ जनों में वैचारिक मतभेद पैदा करेगा। शीतबाधा धीरे—धीरे नियन्त्रित होगी। रस पदार्थों के दाम बढ़ेंगे।

कल्पवासियों के लिए विशेष है माघी पूर्णिमा

संगम स्थल पर एक मास तक कल्पवास करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए आज की तिथि का विशेष पर्व है। माघी पूर्णिमा को एक मास का कल्पवास पूर्ण भी हो जाता है। इस पुण्य तिथि को सभी कल्पवासी गृहस्थ प्रातःकाल गंगा स्नान कर गंगा माता की आरती और पूजा करते हैं तथा अपनी-अपनी कुटिया में आकर हवन करते हैं, फिर साधु—संन्यासियों तथा ब्राह्मणों एवं भिक्षुओं को भोजन कराकर स्वयं भोजन ग्रहण करते हैं और कल्पवास के लिए रखी गई खाने-पीने की वस्तुएं, जो कुछ बची रहती है, उन्हें दान कर देते हैं।

इसके बाद गंगा जी की 'रेणुका' कुछ प्रसाद-रोली एवं रक्षासूत्र तथा गंगाजल लेकर फिर से गंगा माता के 'दरबार' में उपस्थित होने की प्रार्थना कर अपने-अपने घरों को जाते हैं।

— ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र

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