दिव्य विरासत से रूबरू कराती है मकर संक्रांति तो अस्तित्व की सहजता को दर्शाता है तिल

2019-01-15T12:55:22+05:30

मकर संक्रांति प्रारंभ होती है हमारी पहली फसल उगने और उसे सब में बांटने से। कठिन मेहनत करने के बाद उसके फल को प्राप्त कर उसे आपस में बांटने के लिए उत्सव मनाया जाता है।

त्यौहारों के बारे में हमेशा कुछ ऐसा होता है, जो खूबसूरत ही होता है। भारतीय त्यौहारों में कहीं न कहीं गहरा संदेश और अनुष्ठानों में अनोखापन होता है। हर त्यौहार उन दिव्य गुणों की पहचान है जो हमारे अंदर भी अंर्तनिहीत हैं। जिस प्रकार दिवाली हमारे अंदर के प्रकाश से हमारा पुनर्मिलन करवाती है, उसी प्रकार मकर संक्रांति हमारी दिव्य विरासत से हमें रूबरू करवाती है। यही नहीं, वह हमें बांटने के हमारे मानवीय दायित्व का भी आभास करवाती है।

मकर संक्रांति प्रारंभ होती है, हमारी पहली फसल उगने और उसे सब में बांटने से। कठिन मेहनत करने के बाद उसके फल को प्राप्त कर, उसे आपस में बांटने के लिए उत्सव मनाया जाता है। गांवों में, पहली गन्ने की फसल या पहली चावल की खेप ईश्वर को समर्पित करते हैं और फिर एक-दूसरे के साथ बांटते हैं। इसके बाद ही किसान अपनी फसल को प्रयोग में लाता है। संक्रांति का मूल भाव ही बांटने की संस्कृति का होता है और यह सिर्फ फसल तक ही सीमित नहीं है।

त्यौहार हमें यह भी याद दिलाते हैं कि इस दिव्य विरासत को हम उन लोगों में भी बांटें, जो अपेक्षाकृत कम भाग्यशाली हैं। संक्रांति के साथ एक और परंपरा जुड़ी हुई है कि इस दिन गुड़-तिल बांटे जाते हैं। इसके पीछे भी बहुत बड़ा संदेश है। तिल जहां हमारे अस्तित्व की सहजता को दर्शाता है, वहीं गुड़ दुनियाभर मिठास को। इस प्रतीकात्मक तथ्य के पीछे उद्देश्य ही यह है कि सबके पास यह आशीर्वाद हो कि वे सहज, सामान्य, अहंकार रहित हों और हमेशा मीठा ही बोलें। हमारा जीवन छोटे से तिल के समान है। तिल बाहर से काला होता है और अंदर से सफेद। यह दर्शाता है कि हमें अपने अंदर उजाला यानि शुद्धता रखनी है। यदि आप तिल को थोड़ा सा रगड़ें तो वह बाहर भी सफेद हो जाता है, अर्थ यही है कि जब हम अपने बाहरी आवरण को उतार देते हैं तो पाते हैं कि हम उतने ही पवित्र हैं।

जब भी कोई खुद को बहुत बड़ा मानने लगता है तो उसका पतन प्रारंभ हो जाता है। यह एक प्रयोगवादी सत्य है। हम अपने आस-पास कई लोगों को देखते हैं। जैसे ही किसी में यह अकड़ आती है कि वह कुछ है, वैसे ही पतन की शुरुआत हो जाती है। इसे जानना हमारे पतन से हमें रोक देता है और यह सिर्फ आध्यात्म की ही देन है।

साल में सिर्फ दो ही दिन ऐसे होते हैं, जब कोई अपनी आध्यात्मिक यात्रा की प्रगति को मूल्यांकित कर सकता है। एक है- मकर संक्रांति और दूसरा- गुरु पूर्णिमा। यह दोनों आपस में भी लगभग आधे-आधे साल के अंतर में ही आते हैं। इस मौके को तुरंत भुनाइए और अपने नवीन संकल्प इस दिन से प्रारंभ करिए। जब आप इस आध्यात्म के रास्ते पर आ जाते हैं, तब आपके लिए कोई साल, कोई दिन या कोई पल ऐसा नहीं होता है कि वह दिव्य न हो। मकर संक्रांति पर उस ईश्वर से अपने संपर्क को महसूस करें और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ें।

श्री श्री रविशंकर

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