मूर्ति निर्माण के पीछे पूरा विज्ञान है। जहां खास तरह की आकृतियां एक खास पदार्थ या तत्वों से बनाई जाती हैं और उन्हें कुछ खास तरीके से ऊर्जावान किया जाता है...


भारत ऐसा देश है, जहां मूर्ति निर्माण का एक पूरा विस्तृत तंत्र था। दूसरी संस्कृतियों ने हमें मूर्ति पूजा करते देखकर गलत समझ लिया कि हम किसी गुडिय़ा या खिलौने को भगवान मानकर उसकी पूजा करते हैं। ऐसा नहीं है। भारत के लोगों को इस बात का पूरा अहसास और जानकारी है कि यह हम ही हैं, जो रूप और आकार गढ़ते हैं। अगर आप इसे आधुनिक विज्ञान के नजरिए से देखें तो आज हम जानते हैं कि हर चीज में एक जैसी ही ऊर्जा होती है, लेकिन दुनिया में हर चीज एक जैसी नहीं है। यह ऊर्जा एक पशु के रूप में भी काम कर सकती है और एक दैवीय रूप में भी। जब मैं दैवीय रूप की बात करता हूं तो मैं आपके बारे में एक अस्तित्व के तौर पर बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि मैं सिर्फ शरीर के संदर्भ में बात कर रहा हूं। अगर हम अपने शरीर के पूरे तंत्र को एक खास तरीके से पहचान लेते हैं, तो यह भौतिक शरीर भी एक दैवीय तत्व में रूपांतरित हो सकता है।


उदाहरण के लिए पूर्णिमा और अमावस्या के बीच की रातें एक दूसरे से काफी अलग होती हैं। चूंकि आजकल हम लोग बिजली की रोशनी में रहने के इतने अधिक आदी हो गए हैं कि हमें इन रातों की भिन्नता का अहसास ही नहीं होता। मान लीजिए कि अगर आप खेतों में, फॉर्महाउस में या जंगल में ऐसी जगह रह रहे होते, जहां बिजली न हो तो वहां शायद आपको इन रातों के अंतर का असर पता चलता। तब आप समझ पाते कि हर रात अलग होती है, क्योंकि हर रात अलग समय पर चंद्रमा निकलता है और हर रात उसका आकार भी अलग-अलग होता है। हालांकि चंद्रमा वही है। हर रात उसका अस्तित्व बदलता नहीं हैं। वही एक चंद्रमा अलग-अलग समय पर अलग-अलग प्रभाव डालता है। अपने अंदर जरा सा बदलाव लाकर यह कितना फर्क डालता है। इसी तरह से अगर आप अपने शरीर के ऊर्जा तंत्र में जरा सा बदलाव कर दें तो यह शरीर जो फिलहाल मांस का लोथड़ा है, वह अपने आप में दिव्य अस्तित्व बन सकता है।

योग की प्रणाली भी इसी सोच से प्रेरित है। धीरे-धीरे अगर आप इस ओर समुचित ध्यान देंगे और साधना करेंगे तो आप पाएंगे कि यह शरीर सिर्फ अपनी सुरक्षा या संरक्षण और प्रजनन के लिए बैचेन नहीं है, बल्कि इसमें बहुत बड़ा रूपांतरण आया है। यह सिर्फ एक भौतिक शरीर भर नहीं बचा है। हालांकि इसमें भौतिकता होगी, जैविकता होगी, लेकिन तब इसे सिर्फ भौतिक तक सीमित रहने की जरूरत नहीं रहेगी। तब यह बिल्कुल अलग धरातल पर पहुंचकर काम करेगा। तब इसकी मौजूदगी बहुत अलग हो उठेगी। अपने यहां मूर्ति निर्माण के पीछे एक पूरा विज्ञान है। जहां एक खास तरह की आकृतियां एक खास तरह के पदार्थ या तत्वों से मिलकर बनाई जाती हैं और उन्हें कुछ खास तरीके से ऊर्जावान किया जाता है। अलग-अलग मूर्तियां या प्रतिमाएं अलग-अलग तरीके से बनती हैं और उनमें पूरी तरह से अलग संभावनाएं जगाने के लिए उनमें कुछ खास जगहों पर चक्रों को स्थापित किया जाता है। मूति निर्माण अपने आप में एक विज्ञान है, जिसके जरिए आप ऊर्जा को एक खास तरीके से रूपांतरित करते हैं, ताकि आपके जीवन स्तर की गुणवत्ता बढ़ सके। भारत में मंदिरों के निर्माण के पीछे भी एक गहन विज्ञान है। ये मंदिर पूजा के लिए नहीं बनाए गए थे। जब मैं मंदिर की बात करता हूं तो मेरा आशय भारत के पुरातन यानी प्राचीन मंदिरों से होता है। आजकल के मंदिर तो किसी शॉपिंग कॉप्लेक्स की तरह बने हुए हैं।

अगर मंदिर के मूलभूत पक्षों को मसलन - प्रतिमाओं का आकार और आकृति, प्रतिमाओं द्वाराधारण की गई मुद्रा, परिक्रमा, गर्भगृह और प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित करने के लिए किए गए मंत्रोच्चारण आदि में समुचित समन्वय का ध्यान रखा जाए तो एक शक्तिशाली ऊर्जा तंत्र तैयार हो जाता है। भारतीय परंपरा में कोई आपसे नहीं कहता कि अगर आप मंदिर जा रहे हैं तो आपको पूजा करनी ही होगी, पैसे चढ़ाने होंगे या कोई मन्नत मांगनी होगी। ये सारी चीजें ऐसी हैं, जो बहुत बाद में शुरू हुई हैं। पारंपरिक रूप से आपको बताया जाता था कि जब आप मंदिर जाएं तो वहां कुछ देर के लिए बैठें, तब वापस आएं। क्योंकि वहां खासतौर से एक ऊर्जा क्षेत्र तैयार किया गया है, लेकिन अब आप मंदिर जाते हैं और मंदिर के फर्श पर पल भर के लिए अपना आसन टिकाते हैं और चल देते हैं। सिर्फ ऐसा करना भर ही आपके मंदिर जाने के उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता।ऐसे पहचान करें असली और नकली इंसानों की: ओशोअरेंज मैरिज खत्म हो तभी दहेज की समस्या दूर होगी : ओशोऊर्जा स्थल के रूप में तैयार होते थे मंदिर
मंदिर जाने का यह तरीका नहीं है। सुबह अपने कामकाज के लिए बाहर निकलने से पहले आप कुछ देर के लिए मंदिर जरूर जाएं। यह खुद को जीवन के सकारात्मक स्पंदन से भरने का एक तरीका है, ताकि जब आप घर से बाहर निकलें तो एक अलग नजरिए के साथ हों। पुराने जमाने में मंदिर भगवान का स्थान या प्रार्थना स्थल के रूप में नहीं बने थे, न कि मंदिरों में किसी को प्रार्थना कराने की इजाजत थी। इन्हें एक ऊर्जा स्थल के रूप में तैयार किया गया था, जहां कोई भी जाकर ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकता था।

Posted By: Vandana Sharma