यह संसार एक प्रकार से मानव का शुत्र पं उमा शंकर

2019-05-04T10:59:42+05:30

बाबा त्रिवटीनाथ मंदिर में चल रही श्रीरामचरितमानस कथा

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BAREILLY :
बाबा त्रिवटीनाथ मंदिर में चल रही रामकथा के तीसरे दिन कथा व्यास पंडित उमा शंकर व्यास ने बताया कि यह संसार ही एक प्रकार से मानव का शत्रु होता है। इसमें रहने वाले जो दुर्गुण दुर्विचार है वे ही हमारे विरूद्ध चल रहे हैं, उन्हीं पर विजय प्राप्त करनी है। उसके लिए जीवन में धर्म रूपी रथ की आवश्यकता होती है, जिस पर बैठकर उसके विरुद्ध विजय प्राप्त की जा सकती है। कथा व्यास ने कहा कि जीवन में कितना भी सुदृड़ कवच आप पहन लीजिए परंतु उसको भी बेधा जा सकता है। परंतु श्री राम ने कहा कि जिसके जीवन में गुरु के प्रति समर्पण की भावना है उसको परास्त करना असंभव है।

 

तुलसीदास जी ने कहा है,

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर,

जाके अस हथ होई दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।

अर्थात् महाराज मनु के मन में पुत्र के प्रति राग है क्योंकि पुत्र आज्ञाकारी है और पत्‍‌नी मनोकूल है, इसलिए वैराग्य नहीं हो पा रहा है। बहूधा देखा यह जाता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में वैराग्य की भावना आती है। अनुकूलता जीवन में राग बढ़ाती है। मनु ने सोचा कि जब मेरे जीवन में वैराग्य नहीं है तो मैं व्यर्थ में वैराग्य को लाने की चेष्टा में नहीं पढूंगा, यदि भगवान को ही पुत्र बना लिया जाए तो भगवान की प्राप्ति हो जाएगी। राग की सार्थकता भी।

बड़ी संख्या में श्रोता रहे मौजूद

कथा में बताया कि महाराजा मनु ने भगवान से यह मांगा कि आप मेरे पुत्र ही ना बनें अपितु एक घोर सांसारिक व्यक्ति में जैसा पुत्र के प्रति प्रेम होता है। वैसा ही राग मुझे आपके प्रति हो, शतरूपा जी ने भगवान से पुत्र बनने के साथ-साथ ज्ञान भी मांगा कि मुझे आपके ईश्वर रत्‍‌न का भान बना रहे किंतु मनु का अभिप्राय है, कि जब ईश्वर ही पुत्र बन जाए तब राग की पराकाष्ठा होनी चाहिए। कथा के भक्तों ने आरती की तथा प्रसाद वितरण हुआ। इस मौके पर मंदिर कमेटी के प्रताप चंद्र सेठ, हरि ओम अग्रवाल तथा मीडिया प्रभारी संजीव औतार अग्रवाल आदि मौजदू रहे।

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