Pulwama Terror Attack कोई बच्चे का मुंह न देख सका तो किसी की होने वाली थी शादी ये शहीद छोड़ गए कुछ ऐसी कहानी

2019-02-16T11:04:59+05:30

पुलवामा में गुुरुवार को सीआरपीएफ के जवानों का काफिला जा रहा था। तभी हुए आतंकी हमले ने एक गाड़ी को निशाना बनाया और 40 जवानों की शहादत हो गई। ये देश के सिर्फ 40 जवान ही नहीं थे बल्कि चालीस परिवारों की कहानियां थे

newsroom@inext.co.in: शहीद सीआरपीएफ जवानों में किसी को अपनी मां के कैंसर का इलाज कराना था तो कोई ऐसा भी था जो हाल में पैदा हुए अपने बच्चे का एक बार भी मुंह नहीं देख सका। किसी का पैदा होने वाला बेटा अब अपने पिता साए के बिना दुनिया में आएगा तो कई मासूमों को बचपन ही सूना हो गया। कोई अपने घर का इकलौता चिराग था। कोई घर में इकलौता कमाने वाला था।

2 महीने की बेटी का चेहरा तक नहीं देख पाए शहीद रोहिताश

राजस्थान के रोहिताश लांबा भी शहीद हो गए हैं। बताया जा रहा है कि करीब एक साल पहले ही रोहिताश शादी के बंधन में बंधे थे। दो माह पहले ही उनकी पत्नी ने बच्ची को जन्म दिया था। तबसे घर न लौट पाने के कारण उन्होंने अपनी दुधमुहीं बच्ची का मुंह नहीं देखा था। पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े रोहिताश थे, जिनकी उम्र महज 28 वर्ष से भी कम रही। उनके एक करीबी दोस्त ने बताया कि बच्ची को देखने के लिए रोहिताश होली पर घर आने वाले थे, लेकिन इसके पहले ही वो शहीद हो गए। उनकी शहादत की खबर सुनकर घर में ही नहीं बल्कि पूरे गांव में शोक का माहौल है। उनके दोस्त ने बताया श्रीनगर से आए एक फोन कॉल से रोहिताश के घर पर मातम पसर गया। फोन पर सीआरपीएफ के मेजर ने घर वालों को शहादत की खबर दी तो सुनकर सबके होश उड़ गए। रोहिताश के भाई जीतेंद्र (जीतू) लांबा की तो तबीयत बिगड़ गई। गांव में अलग-अलग जगह लोग सामने बैठे रहे और रोहिताश की शहादत, उसकी बहादुरी की चर्चा करते रहे। रोहिताश सेना की तैयारी करने वाले सभी युवाओं के साथ भी समय निकालकर जाते थे और अपनी तरफ से टिप्स भी देते थे।

शहीद बेटे अवधेश का इंतजार कर रही कैंसर पीडि़त मां

पुलवामा में हुए आंतकी अटैक में चंदौली के पड़ाव क्षेत्र के बहादुरपुर गांव निवासी अवधेश यादव उर्फ दीपू भी पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद हो गए। बीते मंगलवार को ही वे यहां से ड्यूटी पर वापस गए थे। इसके पहले उन्होंने अपनी कैंसर पीडि़त मां से कहा था कि लौटने पर मां को डॉक्टर को दिखाएंगे। गुरुवार शाम जब हमले में उनके शहीद होने की खबर आई तो गांववालों ने परिवार से इस खबर को छिपाए रखा। हालांकि लोग घर के बहर जुटने लगे। इससे मां मालती देवी सशंकित हो जाती हैं। वह बारबार अवधेश के घर का नाम दीपू लेकर पुकारती हैं। मां को अब भी उम्मीद है कि बेटा वापस लौटेगा।

6 माह पहले पिता का निधन अब बेटे की शहादत

शहीद वसंत के परिवार के लिए यह दूसरा झटका है, क्योंकि वसंत के पिता वासुदेवन का छह महीने पहले ही निधन हुआ है। वसंत के चचेरे भाई सजीवन ने कहा कि तरक्की और बटालियन में बदलाव के बाद उनके भाई की कश्मीर में तैनाती हुई थी। इससे पहले वह पंजाब में सेवाएं दे रहे थे। वह पांच दिन की छुट्टी पर अपने परिवार के साथ समय बिताने के लिए आए थे। सजीवन ने बताया उनके दो बच्चे - बेटा अमनदीप (5) और बेटी अनामिका (8) - को इस बारे में नहीं बताया गया है। मेरे भाई ने बल को 17 साल तक सेवाएं दी हैं और उनके रिटायरमेंट में सिर्फ दो साल का वक्त बाकी रह गया था।
घर के इकलौते चिराग, नवंबर में होनी थी शादी
हरियाणा में रोपड़ के रोली गांव के कुलविंदर सिंह पुलवामा में शहीद हो गए। वे घर में इकलौते बेटे थे और घर में अकेले कमाने वाले थे। उनकी शादी 11 नवंबर की तय हो गई थी। घर में खुशियों का माहौल था जो कि एकदम से मातम में बदल गया। 26 साल के कुलविंदर की शहीदी पर गांव वाले गर्व कर रहे हैं। घर में मां अस्वस्थ हैं तो पिता भी ट्रक ड्राइवर हैं। उनका ड्राइविंग लाइसेंस खत्म होने पर वे घर में ही रहते हैं। साथ मे बूढे दादा भी रहते हैं। कुलविंदर 10 तारीख को ही गांव से छुट्टियां काट कर गए थे।
24 घंटे पहले बताया सब ठीक, फिर आई शहादत की खबर
आगरा में जैसे ही कौशल रावत के शहीद होने की खबर आई वैसे ही सभी लोग उनके घर की ओर दौड़ पड़े। बुजुर्ग मां-बाप का बुरा हाल है। तीन दिन पहले ही कौशल लीव खत्म करके वापस ड्यूटी पर लौटे थे। कौशल कुमार, थाना ताजगंज कहरई गांव के रहने वाले थे। उनके बड़े भाई कमल किशोर ने बताया कि 47 साल के कौशल से बुधवार शाम को ही बात हुई थी, तब उन्होंने बताया था कि मैं रास्ते में हूं। अभी जॉइनिंग प्वाइंट नहीं पहुंचा हूं क्योंकि आगे बर्फबारी हो रही है। इसलिए वाहन रोके गए हैं। अगले दिन शाम 7.30 बजे खबर मिली कि उनका भाई शहीद हो गया है।
फोन करने का किया था वादा आई शहादत की न्यूज
आंतकी हमले में वाराणसी के लाल रमेश यादव के शहीद होने की खबर मिलते ही थर्सडे की रात से चौबेपुर इलाका गम में डूब गया। आतंकी हमले से कुछ पहले ही रमेश ने पत्नी रेनू और अन्य परिजनों से बात की थी। रेनू ने बताया कि उन्होंने कहा था कि वह जम्मू कैम्प से श्रीनगर जा रहे हैं और वहां पहुंचकर फिर बात करेंगे। काफी देर तक जब फोन नहीं आया तो रेनू ने कई बर उनको फोन मिलाया पर नॉट रीचेबल का मैसेज आता रहा। रात आठ बजे सीआरपीएफ हेड क्वार्टर से उनके शहीद होने की खबर मिली तो रमेश का गांव गम में डूब गया। तोहफापुर के रमेश यादव दो दिन पहले ही एक महीने की लीव पूरी करके जम्मू गए थे। पिता श्यामनारायण यादव ने कहा कि उनका कमाने वाला बेटा शहीद हो गया, अब घर कैसे चलेगा।

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