आलंपिक कोटा हासिल करने वाला तीसरा शूटर बना सौरभ

2019-03-01T06:00:16+05:30

आलंपिक कोटा हासिल करने वाला तीसरा शूटर बना सौरभ

एक दिन में 16-16 घंटे करता था प्रैक्टिस, लंच और ब्रेकफास्ट तो अक्सर छोड़ देता था

घर में ही बना ली थी रेंज, सिर्फ गोल्ड लाने के मकसद से करता था प्रैक्टिस

MEERUT । भारतीय शूटर सौरभ चौधरी ने दिल्ली में चल रहे आईएसएसएफ व‌र्ल्ड कप में स्वर्ण पदक जीतकर अपने गांव ही अपने देश का नाम पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया। सौरभ ने इस व‌र्ल्ड कप में पुरुष 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में यह उपलब्धि हासिल की। सौरभ ने व‌र्ल्ड रिकॉर्ड बनाते हुए 245 अंक हासिल किए। उन्होंने यूक्रेन के ओलेह ओमेलचुक (243.6 अंक) के रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया। स्वर्ण पदक के साथ ही सौरभ ने 2020 टोक्यो ओलंपिक खेलों के लिए कोटा भी हासिल कर लिया। सौरभ यह कोटा पाने वाले तीसरे भारतीय शूटर बन गए हैं। सौरभ से पहले अपूर्वी चंदेला और अंजुम मौद्गिल को भी ओलिंपिक कोटा मिल चुका है। सौरभ के बड़े भाई नितिन चौधरी ने बताया कि सौरभ ने दिल्ली की करणी रेंज पर चल रहे आइएसएसएफ व‌र्ल्ड कप के लिए अपने 10वीं की बोर्ड परीक्षा भी छोड़ दी है।

शूटिंग में करियर बनाने की जिद

यूपी के बागपत के छोटे से गांव कालीना में रहने वाले किसान परिवार के बेटे शूटर सौरभ चौधरी ने का जन्म 11 मई 2002 को जनपद मेरठ के कलीना गांव में किसान परिवार में हुआ। 13 साल की उम्र में सौरभ ने फैसला किया कि वह शूटिंग में ही अपना करियर बनाएंगे।

13 साल की उम्र में

सौरभ के पिता जगमोहन ने बताया कि सौरभ ने 2015 में मात्र 13 साल की उम्र में अपने साथियों को देखकर शूटिंग सीखना शुरू किया था। तीन साल की प्रेक्टिस के बाद 16 साल की उम्र में ही उसने देश के लिए पहला गोल्ड जीत लिया यह बड़ी उपलब्धि थी। पिछले 3 वर्षो से सौरभ ने बागपत के बिनौली स्थित वीर शाहमल राइफल क्लब पर कोच अमित सोरान के निर्देशन में शूटिंग का प्रशिक्षण लिया और अपने हुनर को दिशा दी।

साईं लेकर गया था सौरभ को

सौरभ के भाई नितिन ने बताया कि वह 2016 में साई (स्पो‌र्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) में सौरभ को हर साल होने वाले ट्रायल के लिए ले गए। ट्रायल के दौरान सौरभ के निशानों से वहां के शूटिंग कोच बेहद प्रभावित हुए। जिसके बाद उन्होंने सौरभ को सलेक्ट कर लिया। इसके बाद सौरभ को देश और विदेश में कई प्रतियोगिताओं में खेलने का अवसर मिला।

कोच ने दी थी पिस्टल

सौरभ के पिता जगमोहन सिंह किसान हैं। पिता का कहना है कि शूटिंग का खेल काफी महंगा खेल है। सौरभ को इस खेल की जिद थी इसलिए उन्होंने लोगों से उधार भी लिया। सौरभ के पिता जगमोहन ने बताया कि सौरभ के कोच ने सौरभ का निशाना देखा था और उन्हें सौरभ पर भरोसा था। मगर शूटिंग के लिए एक पिस्टल की जरूरत थी। तो कोच अमित ने सौरभ को प्रैक्टिस के लिए अपनी पिस्टल दी थी।

पिता ने लिया लोन

सौरभ के भाई नितिन ने बताया कि 5-6 महीने प्रैक्टिस के बाद उसे साई की तरफ से नेशनल खेलने का मौका मिला। सौरभ ने पिता जगमोहन से नई पिस्टल खरीदने का आग्रह किया लेकिन सौरभ की जरूरत और उसकी लग्न को देखते हुए भी पिता ने रूपयों की कमी का हवाला देते हुए मना कर दिया। नितिन ने बताया कि मां ब्रजेश देवी और कोच अमित ने जब सौरभ के पिता से काफी मौन-मुनव्वल किया तो उन्होंने बैंक से तीन लाख का लोन लेकर सौरभ के लिए पिस्टल खरीदी।

ब्रेकफास्ट और लंच छोड़ देता था सौरभ

नितिन ने बताया कि सौरभ पर देश का नाम रोशन करने और गोल्ड जीतने का एक जुनून सवार है। वह बिनौली शूटिंग रेंज में 8 से 10 घंटे की रोजाना प्रेक्टिस करता है। नितिन ने बताया की शूटिंग के लिए सौरभ का जुनून ऐसा रहा है कि वह अक्सर ट्रेनिंग के चक्कर में लंच और ब्रेकफास्ट छोड़ देता था। वहीं एशियन गेम्स से पहले सौरभ ने अपने घर में ही एक 10 मीटर रेंज बनाई हुई थी, जहां वह पूरी-पूरी रात प्रैक्टिस किया करता था। कभी-कभी एक दिन में वह 16-16 घंटे भी प्रैक्टिस किया करता था। उसका मकसद किसी भी प्रतियोगिता में बस गोल्ड लाने पर होता था। हालांकि अब सौरभ ने घर में ही इलेक्ट्रॉनिक शूटिंग रेंज बनवा ली है।

ओलंपिक कोटा ही पदक है

सौरभ की मां ब्रजेश देवी का कहना है कि उनके बेटे ने ओलंपिक कोटा हासिल कर ये साबित कर दिया है कि वह खरा सोना है। उसने तीन साल में बहुत गोल्ड हासिल किए हैं लेकिन एक ओलंपिक गोल्ड मिल जाए तो दिल को सुकून हो जाएगा क्योंकि ये सौरभ का भी सपना है।

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सौरभ को बचपन से ही बंदूकों से खेलने का शौक था। जब छोटा था तो गांव में लगने वाले मेले में गुब्बारों पर निशाने लगाने के लिए हमेशा घर से पैसे ले जाया करता था।

निशांत चौधरी, भाई

परिवार ने सौरभ को हमेशा से सभी चीज में सपोर्ट किया है। वह पढ़ाई से जी चुराकर निशानेबाजी को ज्यादा समय दिया करता था। तब उसे हम डांटते जरूर थे लेकिन आज वही निशानेबाजी हमारे गांव की पहचान बन गई है।

ब्रजेश देवी, मम्मी

शूटिंग के चक्कर में सौरभ हमेशा से सभी से बहुत कम मतलब रखता था। वह पूरा-पूरा दिन अपनी प्रैक्टिस में बिजी रहता था। पूरे परिवार और उसके कोच को ये यकीन हमेशा था कि एक दिन सौरभ कुछ बड़ा करेगा।

जगमोहन सिंह, पापा

inextlive from Meerut News Desk


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