सुखदेव बर्थ एनिवर्सरी भगत सिंह और राजगुरु के साथ इन्हें भी है पाकिस्तान से न्याय की आस

2019-05-15T10:46:39+05:30

महान क्रांतिकारी सुखदेव को भी भगत सिंह और राजगुरु के साथ पाकिस्तान से न्याय की आस है। आइए उनकी जयंती पर जानें उनसे जुड़ा ये खास किस्सा

कानपुर। महान क्रांतिकारी सुखदेव का जन्म 15 मई 1907 को हुआ था। इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो उन्हें सुखदेव ने 23 साल की उम्र में भगत सिंह और राजगुरु के साथ अपना जीवन कुर्बान कर दिया था। इन तीनों लोगों को एक साथ फांसी दी गई थी। इनकी फांसी को लेकर बहुत से लोगों के मन में सवाल हैं वहीं आज भी भगत सिंह और राजगुरु के साथ सुखदेव को भी न्याय की आस है। खास बात तो यह है कि इनके लिए लाहौर के एक वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी पिछले कुछ सालों से वहां कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

कुरैशी की लड़ाई इस मामले में है जारी
इम्तियाज राशिद कुरैशी की लड़ाई इस मामले में लगातार जारी है। हांफिग्टन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक इम्तियाज राशिद कुरैशी ने भगतसिंह मेमोरियल फाउंडेशन की स्‍थापना की और वे इसके अध्‍यक्ष भी हैं। उनका कहना है कि  भगत सिंह को गलत तरीके से फांसी दी गई थी। इम्तियाज राशिद कुरैशी का कहना है कि इस महान क्रांतिकारियों के न्याय के लिए उन्हें अपनी लड़ाई में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।   कुरैशी ने 2013 में लाहौर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सांडर्स मर्डर केस को फिर से खोले जाने का अनुरोध किया था।

फांसी के पीछे का सच सबके सामने लाना

कुरैशी का मकसद इन क्रांतिकारियों की फांसी के पीछे का सच सबके सामने लाना है। ब्रिटिश पुलिसअधिकारी जॉन पी सांडर्स और हेड कांस्टेबल चानन सिंह की हत्या में दो अज्ञात बंदूकधारियों के खिलाफ 17 दिसंबर 1928 को शाम 4:30 बजे अनारकली पुलिस स्टेशन में उर्दू में एफआईआर दर्ज की गई थी। इस मामले में अनारकली पुलिस के एक पुलिस अधिकारी जो शिकायतकर्ता के साथ-साथ गवाह थे, ने कहा कि वह जिस आदमी का पीछा कर रहे थे वह "पांच फीट 5 इंच का के थे। उनका हिंदू चेहरा, छोटी मूंछें और शरीर पतला और मजबूत था।

फांसी का समय 11 घंटे पहले कम हुआ था

दोनों शख्स पजामा कुर्ता के साथ छोटी काली क्रिस्टी टोपी पहने थे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी के लेकर कहते हैं कि उन्हें लाहौर में मौत की सजा सुनाई गई और 24 मार्च 1931 को फांसी देने का आदेश दिया गया था। हालांकि अचानक से फांसी के समय को 11 घंटे पहले कम कर दिया गया था। तीनों को 23 मार्च 1931 को शाम 7:30 बजे लाहौर जेल में फांसी दे दी गई। कुरैशी कहते हैं कि हम यह नहीं कर रहे हैं कि भगत सिंह ने सॉन्डर्स की हत्या की या नहीं लेकिन बस यह पता चले कि किस आधार उन्हें फांसी दी गई क्योंकि प्राथमिकी में तो उनका नाम ही नहीं दर्ज था।
कई तालों में कैद है आजादी के मतवाले सुखदेव का
रिकॉर्ड का मोहताज नहीं भगत सिंह के शहीद का दर्जा
300 से अधिक गवाहों से पूछताछ नहीं हुई

कुरैशी का यह भी कहना है कि इस मामले में नामित 300 से अधिक गवाहों से भी पूछताछ नहीं की गई थी। उन्हें लाहौर उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार के आदेश पर फांसी दी गई थी जबकि उसके पास ऐसा कोई अधिकार होता ही नहीं है। इसीलिए उन्होंने इस मामले को दोबारा खोलने की मांग की। वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी का कहना है जब भगतसिंह, राजुगुरू और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को सजा हुई तब भारत का बटवारा नहीं हुआ था। ऐसे में वह संपूर्ण भारत की लड़ाई लड़ रहे थे। इसलिए वे पाकिस्‍तान के भी हीरो हैं और उन्‍हें न्‍याय मिलना ही चाहिए।



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