जहां बुद्धि का काम हो वहां बुद्धि ही चलनी चाहिए

2018-06-05T12:02:56+05:30

आचार्य विनोबा भावे मशीन में दो प्रकार के यंत्र लगे होते हैंएक दिशा दिखाने वाला और दूसरा गति बढ़ाने वाला। दोनों यंत्रों की समयसमय पर जरूरत पड़ती रहती है। मशीन की तरह ही मनुष्य के चित्त में भी बुद्धि और धृति दोनों होती है। धृति या धारणा शक्ति यानी अपने को रोकने की शक्ति। कहावत हैपढ़ें पर गुने नहीं।

 


आचार्य विनोबा भावे मशीन में दो प्रकार के यंत्र लगे होते हैं-एक दिशा दिखाने वाला और दूसरा गति बढ़ाने वाला। दोनों यंत्रों की समय-समय पर जरूरत पड़ती रहती है। मशीन की तरह ही मनुष्य के चित्त में भी बुद्धि और धृति दोनों होती है। धृति या धारणा शक्ति यानी अपने को रोकने की शक्ति। कहावत है-पढ़ें पर गुने नहीं। 
सूक्ष्मता से विचार करने पर पता चलता है कि स्वयं को इंद्रियों का विषय बनाने के लिए अपने-आप पर थोड़ा नियंत्रण करना पड़ता है। वह नियंत्रण माता-पिता या गुरु का हो सकता है। अपना खुद का नियंत्रण हो, तो बहुत अच्छा होगा। जिसकी बुद्धि को एक विचार जंच जाता है, तो वह आगे उस पर अमल करने के लिए और कुछ नहीं करना चाहता है। वह उस पर अमल करता रहता है। 
यदि कोई विचार व्यक्ति को समझ में नहीं आता है, तो वह उस पर अमल नहीं करता। समझ में आने पर बीच में दूसरी ताकतें बाधा नहीं डालतीं। ऐसे लोगों को सांख्य यानी ज्ञानी कहते हैं। कुछ लोगों की निष्ठा पक्की होती है। उनकी निष्ठा खंडित नहीं होती है। उन्होंने जो भी विचार ग्रहण किया होता है, उस पर उनका विश्वास पक्का होता है। 
कुछ लोगों को प्रयोग पर विश्वास होता है। जब तक वे किसी चीज पर प्रयोग के बाद संतुष्ट नहीं हो जाते हैं, तब तक वे उसे सही नहीं मानते हैं। प्रयोग में जरा भी संशय रहने पर वे ज्ञान ग्रहण नहीं करते हैं। सच यह है कि जहां बुद्धि का काम हो, वहां बुद्धि ही चलनी चाहिए। कुछ चीजें और मान्यताएं ऐसी हैं, जहां बुद्धि की नहीं, श्रद्धा की जरूरत पड़ती है। जहां बुद्धि चलती है वहां श्रद्धा को लाना गलत है। आंख के क्षेत्र में कान को पूछना और कान के क्षेत्र में आंख को पूछना गलत है।

 

 

आचार्य विनोबा भावे मशीन में दो प्रकार के यंत्र लगे होते हैं-एक दिशा दिखाने वाला और दूसरा गति बढ़ाने वाला। दोनों यंत्रों की समय-समय पर जरूरत पड़ती रहती है। मशीन की तरह ही मनुष्य के चित्त में भी बुद्धि और धृति दोनों होती है। धृति या धारणा शक्ति यानी अपने को रोकने की शक्ति। कहावत है-पढ़ें पर गुने नहीं। 

सूक्ष्मता से विचार करने पर पता चलता है कि स्वयं को इंद्रियों का विषय बनाने के लिए अपने-आप पर थोड़ा नियंत्रण करना पड़ता है। वह नियंत्रण माता-पिता या गुरु का हो सकता है। अपना खुद का नियंत्रण हो, तो बहुत अच्छा होगा। जिसकी बुद्धि को एक विचार जंच जाता है, तो वह आगे उस पर अमल करने के लिए और कुछ नहीं करना चाहता है। वह उस पर अमल करता रहता है। 

यदि कोई विचार व्यक्ति को समझ में नहीं आता है, तो वह उस पर अमल नहीं करता। समझ में आने पर बीच में दूसरी ताकतें बाधा नहीं डालतीं। ऐसे लोगों को सांख्य यानी ज्ञानी कहते हैं। कुछ लोगों की निष्ठा पक्की होती है। उनकी निष्ठा खंडित नहीं होती है। उन्होंने जो भी विचार ग्रहण किया होता है, उस पर उनका विश्वास पक्का होता है। 

कुछ लोगों को प्रयोग पर विश्वास होता है। जब तक वे किसी चीज पर प्रयोग के बाद संतुष्ट नहीं हो जाते हैं, तब तक वे उसे सही नहीं मानते हैं। प्रयोग में जरा भी संशय रहने पर वे ज्ञान ग्रहण नहीं करते हैं। सच यह है कि जहां बुद्धि का काम हो, वहां बुद्धि ही चलनी चाहिए। कुछ चीजें और मान्यताएं ऐसी हैं, जहां बुद्धि की नहीं, श्रद्धा की जरूरत पड़ती है। जहां बुद्धि चलती है वहां श्रद्धा को लाना गलत है। आंख के क्षेत्र में कान को पूछना और कान के क्षेत्र में आंख को पूछना गलत है।


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