काको लागूं पाएं

2013-09-04T09:01:00+05:30

Meerut पहले गुरुजी अब यौन उत्पीडऩ के आरोपी आसाराम प्रकरण ने कई सवाल खड़े किए हैं पहले भी चंद्रास्वामी नित्यानंद आदि के कारनामें जगजाहिर हुए लेकिन गोरखधंधा जारी रहा लोग भी सावधान नहीं हुए पहले तो हम प्रवचन सुनते हैं पांव छूते हैं प्रसाद ग्रहण करते हैं बाद में असलियत सामने आती है तो विश्वास टूटकर कांच की तरह बिखर जाता है सवाल है कि गुरु माना किसे जाए? लाइफ में ऐसा क्या होता है जो धर्म गुरुओं की जरूरत महसूस होती है आइए जानते हैैं सिटी के लोगों की फीलिंग्स

ऐसे ‘गुरु’ से मंदिर के भगवान अच्छे
करोड़ों भक्तों की फौज लेकर चलने वाले धर्म गुरु आसाराम बापू का सेक्स स्कैंडल में फंस गए तो हैं, तो कबीर दास का दोहा ‘गुरु गोविंद दोउ खड़े काको लागूं पाएं’ याद आ गया और जेहन में सवाल उभरा कि गुरु माना जाए तो किसे? आखिर लाइफ में ऐसे गुरुओं की जरूरत क्या है? किसलिए है अंधविश्वास या अंधभक्ति? इनसे अच्छे तो पत्थर के भगवान है, जो मंदिर में मिलते हैं? इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमने कुछ प्रमुख लोगों से बात की तो कई अनछुए पहलू सामने आ गए।

किसे माना जाए गुरु?
आज के संदर्भ में ये सवाल काफी जरूरी हो गया है। इस पर लोगों की डिफरेंट राय हो सकती है, लेकिन सीसीएस यूनिवर्सिटी की पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर अर्चना शर्मा कहती हैं कि आसाराम बापू, नित्यानंद या इस तरह के अन्य लोग जो टीवी पर दिखाई देते हैं इन्हें आप बिल्कुल भी गुरु की श्रेणी में न रखें। ये लोगों को अपने शब्दजाल में फंसाते है। इन लोगों को गुरु के समान लाकर करने का मतलब है कि गुरु की महिमा को खंडित करना। दूसरी बात, हम उन लोगों को भी गुरु की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं, जो बच्चों को स्कूल और कॉलेजों में शिक्षा दे रहे हैं। इसका कारण ये है कि वो भी इस काम का पैसा ले रहे हैं। कोई भी निष्काम सेवा नहीं कर रहा है। मैं तो कहूंगी कि मां से बढक़र कोई गुरु नहीं हो सकता। मां हमें हर वो बात सिखाती है, जो जीने के लिए जरूरी है।
मां को गुरु मानता हूं
डॉ। रोबिन चौधरी कहते है कि वह आज भी अपने गुरु को पांव प्रणाम करते है। वह बताते है, मेरे गुरु वो नहीं, जो टीवी पर प्रवचन देते हैं। मेरे गुरु वो भी नहीं, जिन्होंने मुझे पढ़ाया। अब आप भी सोचेंगे आखिर कौन सा गुरु है? अगर दोनों गुरु नहीं है तो गुरु कहते किसे हैं? जी हां, गुरु मेरी मां हैं। मुझे किसी विषय पर कोई ज्ञान हासिल करना होता है तो उन्हीं से सलाह करता हूं।
अंधविश्वास क्यों?
 ‘महाराज’ के साथ लाखों लोगों की भीड़ देखकर कभी-कभी सिर भी चकराने लगता है। लोगों का ऐसे लोगों पर अंधविश्वास देखकर गोरखपुर के पूर्व वीसी अरुण कुमार कहते हैं ये बाबा लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं। इन पर लोगों को बिल्कुल भी विश्वास नहीं करना चाहिए। यहां सिर्फ करप्शन का जाल है। अगर आपने इतिहास में पढ़ा हो तो इंग्लैंड के चर्च में भी करप्शन था। कर्म को मानो, उसी की पूजा करों। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है कि कर्म में ही ईश्वर है। कर्म पर ही विश्वास करना चाहिए।
इनकी जरुरत क्यों?
आखिर लोगों को ऐसे गुरुओं की जरुरत क्या है? क्यों पब्लिक ने अपनी निजी जिंदगी में ऐसे लोगों को महत्व दिया हुआ है। इस सवाल का जवाब में कैंट बोर्ड के सीईओ डॉ। डीएन यादव कहते हैं कि आज जितने भी संत या बाबा हैं, जिन्हें लोग सुबह से लेकर शाम तक सुनते हैं, पढ़ते हैं या देखते भी हैं, इनमें से कोई भी समाज को नई दिशा नहीं दे रहा है। कुछ का चेहरा इतना विकृत निकला कि इंसानियत को भी शर्म आ जाए। इतिहास में हमने जिन गुरुओं के बारे में पढ़ा, इन्होंने उन्हें भी बदनाम किया। जब आसाराम का प्रकरण हमारे सामने है तो लोगों को सावधान हो जाना चाहिए। हर बार कोई न कोई उनके विश्वास को ठेस पहुंचा रहा है।
भूल जाते हैं मां को
मां एक ऐसा शब्द है जो हर किसी की लाइफ में अलग मायने रखता है। मां ही हमें जीवन देती है। जब बच्चा बड़ा हो जाता है तो उसकी प्रॉयरिटी कुछ ओर हो जाती है। सोसायटी में ऐसे भी लोग हैं, जो मां को बुढ़ापे में वद्धाश्रम में छोड़ आते हैं। प्रो। अर्चना शर्मा कहती हैं कि मां से बड़ा टीचर कोई नहीं हो सकता है। मां बच्चे को जो भी सिखाती है वो पूरी तरह से निष्काम होता है। मेडिकल कॉलेज के प्रिंसीपल भी इसी बात से इत्तेफाक रखते हैं। वह कहते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण है ज्ञान प्राप्त करना। फिर माध्यम कुछ भी हो सकता है। ज्ञान पुस्तक पढक़र भी लिया जा सकता है। असली गुरु वो नहीं, जो करोड़ों की प्रॉपर्टी जमा करे। गुरु वो है, जो कुटिया में रहकर समाज कल्याण का काम करें। भटके लोगों को सही रास्ता दिखाए।



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