आपके मन में प्रश्न उठते हैं फिर उत्तर मिलने के बाद क्या होता है?

2019-04-17T11:37:17+05:30

सभी शास्त्रों में सभी प्रश्नों के उत्तर भरे पड़े हैं। तुम खरीद ला सकते हो सब शास्त्र पढ़ भी ले सकते हो कुछ हल न होगा।

प्रश्न: मन में कई प्रश्न उठते हैं, किंतु जी चाहता है, कुछ न पूछूं; केवल चरण-कमलों के पास बैठा रहूं।

मन में प्रश्न ऐसे ही लगते हैं जैसे वृक्षों में पत्ते लगते हैं। वे लगते ही चले जाएंगे। तुम कितना ही पूछो और मैं कितना ही जवाब दूं! मैं इस आशा में जवाब नहीं देता हूं कि मेरे जवाबों से तुम्हारे प्रश्न उठने बंद हो जाएंगे। वह भूल मैं नहीं कर सकता। मुझे भलीभांति पता है कि मेरा हर जवाब तुम्हारे भीतर और दस नए सवाल उठाएगा, इसलिए अगर मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर देता हूं, तो इस ख्याल से नहीं कि तुम्हारे प्रश्न हल हो जाएंगे। सिर्फ इसी ख्याल से कि धीरे-धीरे तुम्हें दिखाई पड़ेगा कि इतने प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं, फिर भी प्रश्नों की भीड़ उतनी की उतनी बनी है। उसमें रत्ती भर कमी नहीं हुई। शायद थोड़ी बढ़ गई हो; नए प्रश्न उठ आए हों क्योंकि नए उत्तर मिले, जो तुमने कभी सुने न थे। मन ने नए प्रश्न उठा दिए। अगर यह तुम्हें दिखाई पड़ना शुरू हो जाए- वही मेरी चेष्टा है; इसलिए तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर देता हूं, उत्तरों को हल करने को नहीं। कोई उत्तर किसी प्रश्न को कभी हल नहीं कर पाता। उलटे हर उत्तर नए प्रश्न को खड़ा कर जाता है।

पूछ-पूछकर कभी कोई ज्ञान को उपलब्ध नहीं हुआ है। जानकारी को उपलब्ध हो जाए भला; खूब जान ले, लेकिन खूब जानने से कुछ ज्ञान का संबंध नहीं है। जागेगा नहीं, अनुभव नहीं होगा। शब्दों से चित्त भर जाएगा। और हर शब्द बीज की तरह नए शब्द पैदा करेगा। और इसकी कोई भी शृंखला का अंत नहीं है। अगर यह तुम्हें दिखाई पड़ने लगे कि प्रश्न तो बहुत उठते हैं, लेकिन पूछने का जी नहीं होता, तो तुम एक बहुत महत्वपूर्ण घड़ी के करीब आ गए। यही तो मेरी सारी चेष्टा है, कि तुम्हारे मन में प्रश्न उठें और पूछने का जी न हो। क्योंकि तुम्हें यह समझ भी आ जाए, कि पूछने से क्या होगा।

सभी शास्त्रों में सभी प्रश्नों के उत्तर भरे पड़े हैं। तुम खरीद ला सकते हो सब शास्त्र, पढ़ भी ले सकते हो, कुछ हल न होगा। लेकिन अगर तुम्हें यह समझ आ जाए, कि उठने दो प्रश्नों को, हम प्रश्नों में पड़ते ही नहीं। हम तो बैठेंगे सत्संग में। हम तो शांत, चुप--अगर किसी ने जाना है तो उसकी मौजूदगी का रस लेंगे। हम बुद्धि से बुद्धि के संवाद में न पड़ेंगे, हम तो अस्तित्व को अस्तित्व से जोड़ेंगे।

विचार कागज की नाव की तरह है, तो फिर भाव क्या है? ओशो से जानें

हमारा जीवन वास्तव में एक गहन प्रयोजन है, अकारण कुछ भी नहीं

जब तुम मुझसे कुछ पूछते हो, मैं तुम्हें कुछ उत्तर देता हूं, तब दो बुद्धियों का संवाद होता है। संवाद भी कठिन है। इधर मैं कह रहा हूं, उधर तुम सोच रहे हो, ठीक नहीं है। पता नहीं ठीक है या नहीं, या उत्तर दे रहे हो, जवाब खोज रहे हो, तुम्हारी मान्यता के अनुकूल नहीं है, तुम्हारे शास्त्र के विरोध में है--हजार तरह का विवाद चल रहा है। अगर तुम बहुत शांत चित्त के व्यक्ति हो, और शास्त्रीय नहीं हो, और शास्त्रों का बोझ नहीं ढो रहे हो अपने सिर पर, तो शायद संवाद हो जाए। यह अगर दिखाई पड़ जाए तो स्वाभाविक फिर तुम पूछना न चाहोगे।

ओशो।


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