विरासत को सहेजने में भी बेरूखी

2018-12-20T06:00:08+05:30

ऐतिहासिक महत्व खो रहा नौचंदी मेला मैदान

निगम की लापरवाही से पौराणिक तथ्य हो रहे क्षतिग्रस्त

हजारों साल पुराने नवचंडी मंदिर और बाले मियां मजार को सुधार की दरकार

MEERUT अपने आप में महमूद गजनी के समय की हजारों साल पुरानी यादें और इतिहास को संजोए मेरठ की पहचान और ऐतिहासिक धरोहर नवचंडी देवी मंदिर या कहें कि नौचंदी मेला अपनी पहचान और ऐतिहासिक महत्व खोता जा रहा है। नवचंडी मंदिर के पास हर साल नौचंदी मेला आज भी लगता है, लेकिन इस मेले के प्रति लोगों का आकर्षण अब खत्म होता जा रहा है। नवचंडी मंदिर के साथ-साथ मेले की एक ओर प्रमुख पहचान बाले मियां की मजार भी प्रशासनिक अनदेखी और निगम की लापरवाही के चलते यहां गंदगी और असमाजिक तत्वों का जमावड़ा है।

नवरात्र के नौंवे दिन मेला

शहर में नौचंदी मेला का इतिहास करीब 350 साल का सुनहरा इतिहास है। सन 1672 में नौचंदी मेले की शुरुआत शहर स्थित मां नवचंडी के मंदिर से हुई थी। इसलिए शुरुआत में इसका नाम नवचंडी मेला रखा गया था, जो बाद में नौचंदी के नाम से जाना गया। नवरात्र के नौवें दिन यहां मेला भरना शुरू होता था। यही नहीं यह मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी कहा जाता है। शहर में जब-जब सांप्रदायिक दंगे हुए तब नौचंदी मेले ने ही हिंदू और मुस्लिम के दिलों की कड़वाहट को दूर किया। दंगों के बाद भी दोनों ही पक्षों के लोग नौचंदी मेले में एक साथ अपनी-अपनी दुकान लगाते हैं।

स्वतंत्रता संग्राम का गवाह

1857 का संग्राम देखने का गौरव भी नौचंदी मेले से अछूता नहीं रहा। क्रांति के दौरान भी इस मेले की रौनक कभी कम न हुई। इसके साथ ही मेले में होने वाला इंडो-पाक मुशायरा इस मेले की जान हुआ करता था। इंडो-पाक मुशायरे में हिंदुस्तान के साथ पड़ोसी मुल्क के शायरों को भी न्योता दिया जाता था। नौचंदी दिन में देहात और रात को शहर का मेला होता था। दिन में दूर-दराज के लोग इस मेले में खरीदारी करने आते थे, जबकि रात होते ही यहां शहरवासियों का जमावड़ा लग जाता था।

पशु मेले के रूप में शुरुआत

अंग्रेजी हुकूमत के वक्त नौचंदी मैदान में बहुत बड़ा पशु मेला भी लगता था। इस मेले में अरबी घोड़ों का व्यापार किया जाता था। आर्मी अपनी फौज के लिए अधिकांश घोड़े इसी मेले से ही खरीदा करती थी।

मेले के दौरान कायाकल्प

नौचंदी मैदान और उससे जुड़ी हुई ऐतिहासिक धरोहर जैसे शंभूदास गेट, पटेल मंडल, नवचंडी मंदिर, बाले मियां की मजार, जय जवान जय किसान प्रतिमा आदि की जिला प्रशासन और नगर निगम को मेले के दौरान ही याद आती है। मेले की शुरुआत से पहले इन सभी धरोहरों की साफ -सफाई कर साज सज्जा कर दी जाती है। जबकि पूरे साल ये धरोहर जर्जर हाल में गंदगी से अटे रहते हैं।

निगम की बनाई दूरी

हालत यह है कि मेला स्थल के प्रमुख नवचंडी मंदिर और बाले मियां की मजार का रख-रखाव तो दूर निगम द्वारा यहां नियमित सफाई भी नहीं होती है। मंदिर परिसर व मजार पर स्ट्रीट लाइट तक नहीं लगाई गई है, जिससे रात में असामाजिक तत्वों का यहां जमावड़ा रहता है।

निगम द्वारा मंदिर परिसर का रख-रखाव तो दूर पिछले छह साल से मंदिर की साफ-सफाई का पैसा तक नही दिया गया है। मंदिर में कई जगह काम होना है, लेकिन निगम के द्वारा कई सालों से यहां कोई काम नहीं किया गया है। केवल मेले के दौरान झाडू लगा दी जाती है।

पं। महेंद्र शर्मा, प्रबंधक नवचंडी मंदिर

बाले मियां मजार का अपना ऐतिहासिक महत्व है। निगम द्वारा एक सफाई कर्मचारी भी यहां सफाई के लिए नहीं भेजा जाता है। मजार कमेटी द्वारा ही इसका संरक्षण व साफ-सफाई की जा रही है।

मुफ्ती मो। अशरफ, मिनजानिब

नौचंदी मेला कई सौ सालों से आयोजित हो रहा है। इसके बावजूद प्रशासन द्वारा पूरे साल इस मैदान की देखभाल नहीं की जाती। मेले के वक्त ही सबको इसका ख्याल आता है।

रजा अली

कम से कम पटेल मंडप का प्रशासन को स्थाई रख-रखाव करना चाहिए। हर साल मोटा बजट बनाकर पटेल मंडप की मरम्मत की जाती है।

अली अरशद

inextlive from Meerut News Desk


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