किसी को कारवां तो किसी को मंजिल की तलाश

2015-01-02T07:02:22+05:30

RANCHI : चुनाव में हार- जीत तो लगी रहती है, पर जब राजनीति के दिग्गज पराजित हो जाते हैं, तो इसका खामियाजा न सिर्फ उन्हें, बल्कि पार्टी को भी तक भुगतना पड़ता है। अब देखिए। झारखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी के अर्जुन मुंडा, जेवीएम सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी, आजसू सुप्रीमो सुदेश कुमार महतो, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत और राजेंद्र प्रसाद सिंह और आरजेडी की अन्नपूर्णा देवी व गिरिनाथ सिंह सरीखे कई धाकड़ नेताओं को चुनाव में जनता ने नकार दिया है। यह हार उतनी बड़ी नहीं है, पर जब राजनीतिक भविष्य पर दांव लग जाए तो खतरा बढ़ जाता है। हालांकि, राजनीति में नेताओं के लिए संभावनाएं हमेशा बनी रहती है। ऐसे में चुनाव में पराजित हुए दिग्गजों की राजनीति आगे कैसी करवट लेगी, यह देखनेवाली बात होगी.

2- अर्जुन मुंडा, बीजेपी

झारखंड में सबसे ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री रहनेवाले अर्जुन मुंडा इस बार भी मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे थे, पर विधानसभा चुनाव में सरायकेला सीट पर मिली हार से उनकी दावेदारी छिन्न- भिन्न हो गई। बीजेपी संगठन और विधायकों के बीच मजबूत पैठ रखनेवाले अर्जुन मुंडा के सामने अब अपने मजबूत वजूद को बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती है।

इन मोर्चो पर हो सकती परेशानी

1- पार्टी संगठन में मजबूत पकड़ पड़ सकती है ढीली

2- समर्थक विधायकों को अपने साथ बनाए रखने की भी है चुनौती

3- सत्ता से दूर रहने से राजनीतिक गतिविधियां पड़ सकती हैं कमजोर

4- पार्टी में चल रही अंदरूनी खेमेबाजी में कमजोर पड़ सकते हैं अर्जुन.

यह बन सकती है संभावना

अर्जुन मुंडा भले ही इसबार चुनाव हार गए हैं, पर उनके लिए पार्टी और सरकार के स्तर पर कई दरवाजे खुले हुए हैं। झारखंड के इस कद्दावर नेता को पार्टी की केंद्रीय समिति भी नजरअंदाज नहीं करना चाहेगी। ऐसे में उनके लिए विकल्प खुले हुए हैं

1- पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की टीम में अर्जुन मुंडा को मिल सकता है बड़ा ओहदा

2- राज्यसभा में जाने का विकल्प। इतना ही नहीं, अगर राज्यसभा बनाए जाते हैं तो उनके लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी बन सकती है जगह.

3- स्टेट बीजेपी का प्रेसिडेंट बनाकर पार्टी की केंद्रीय समिति गैर आदिवासी को सीएम बनाए जाने के बाद आदिवासियों की नाराजगी कर सकती है दूर। हालांकि, उनके कद के लिहाज से स्टेट प्रेसिडेंट का पद कितना मुफीद होगा, यह भी बड़ा सवाल है.

सुदेश कुमार महतो, आजसू

पहले लोकसभा चुनाव और अब विधानसभा चुनाव में आजसू सुप्रीमो सुदेश कुमार महतो को करारी शिकस्त मिली है। वैसे, बीजेपी के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव लड़नेवाली आजसू ने पांच सीटें जीती हैं, पर सुदेश खुद चुनाव हार गए। हमेशा सत्ता से चिपके रहनेवाले सुदेश के लिए यह हार किसी बुरे सपने से कम नहीं है। भविष्य में उनकी राजनीति किस करवट लेगी, यह देखनेवाली बात होगी, पर फिलहाल वे अपने राजनीतिक करियर को लेकर जरूर मंथन कर रहे होंगे.

इन मोर्चो पर हो सकती परेशानी

- सुदेश के चुनाव हार जाने से सदन में पार्टी के जीते विधायक होंगे मजबूत

- रघुवर मंत्रिमंडल में आजसू के बने मंत्री भविष्य में सुदेश के लिए बन सकते हैं कड़ी चुनौती.

3- अगले चार सालों तक पार्टी की गतिविधियों को लगातार संचालित करना और कार्यकर्ताओं को जोड़े रखना.

4- जेएमएम और जेवीएम सरीखी क्षेत्रीय पार्टियों से भी सुदेश व उनकी पार्टी के जनाधार के लिए बन सकता है खतरा.

यह बनती है संभावना

1- बीजेपी के सहयोग से पहुंच सकते हैं राज्यसभा में। इस बाबत बीजेपी की कॉरपोरेट लॉबी सुदेश के लिए कर सकती है प्रयास.

2- संगठन को मजबूत और विस्तार करने के लिए पार्टी गतिविधियों को कर सकते हैं तेज, ताकि पकड़ मजबूत बनी रहे.

3- पार्टी के पास फंड और संसाधनों की कमी नहीं है, जिसका इस्तेमाल सुदेश अपने जनाधार को बनाए रखने के लिए कर सकते हैं.

सुखदेव भगत, कांग्रेस

विधानसभा चुनाव में लगातार दूसरी बार हाल मिलने से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखदेव भगत के राजनीतिक भविष्य पर भी आशंकाएं मंडराने लगी हैं। न सिर्फ पार्टी के प्रदेश स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें कांग्रेस की करारी हार के लिए जिम्मेवार ठहराया जा रहा है। विरोधियों के निशाने पर वे हैं। ऐसे में आनेवाले दिन सुखदेव भगत के लिए आसान नहीं हैं.

इन मोर्चो पर हो सकती है परेशानी

1- सुखदेव भगत के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के कुर्सी को बचाए रखने की होगी चुनौती.

2- पार्टी का विरोधी खेमा हो सकता है मजबूत, सुखदेव पर पद छोड़ने का बना सकता है दबाव

3- पार्टी में व कार्यकर्ताओं के बीच पकड़ हो सकती है कमजोर

4- अपने क्षेत्र में पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुट बनाने रखने में हो सकती हैं मुश्किलें.

संभावनाएं नहीं के बराबर

1- सुखदेव भगत के पास पार्टी के स्तर पर पाने को कुछ भी नहीं है। उनके नेतृत्व में पार्टी ने कांग्रेस ने झारखंड में चुनाव लड़ा, पर करारी हार मिली। ऐसे में अब हार का ठीकरा उनके सिर पर गिर सकता है। हो सकता है कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद गंवाना पड़ जाए। ऐसे में वे अगले कुछ सालों तक सिर्फ पार्टी का झंडा ढोते नजर आ सकते हैं.

अन्नपूर्णा देवी, आरजेडी

हेमंत सरकार में राजद कोटे से मंत्री रहीं अन्नपूर्णा देवी का चुनाव हारना उनके लिए व पार्टी के लिए बड़ा झटका है। झारखंड राजद में अन्नपूर्णा की पकड़ मजबूत मानी जाती है, पर इस हार से उनका प्रभाव कम हो सकता है। भविष्य में वे किस तरह की राजनीति करेंगी, यह देखनेवाली बात होगी.

इन मोर्चो पर हो सकती है मुश्किलें

1- झारखंड राजद में पकड़ हो सकती है कमजोर, बिदक सकते हैं कार्यकर्ता.

2- मंत्री पद नहीं रहने से अपने क्षेत्र में कम हो सकता है जनाधार, राजनीतिक गतिविधियों को लगातार चलाने के लिए करनी पड़ेगी खासी मशक्कत

यह बन सकती है संभावना

1- आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद का आशीर्वाद मिला तो पार्टी संगठन में मिल सकता है बड़ा ओहदा.

2- बिहार में आरजेडी कोटे से राज्यसभा में जाने का भी विकल्प है खुला, पर यह फैसला लालू प्रसाद यादव ही ले सकते हैं.

राजेंद्र प्रसाद सिंह, कांग्रेस

हेमंत सरकार में वित्त व स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र प्रसाद सिंह भी इसबार चुनाव हार गए हैं। कांग्रेस के इस दिग्गज नेता का चुनाव हारना उनके व पार्टी के लिए बड़ी क्षति बताई जा रही है। अब वे पार्टी की राजनीति करेंगे अथवा ट्रेड यूनियन की अथवा दोनों की, यह देखनेवाली बात होगी.

इन मोर्चो पर हो सकती है परेशानी

1- पार्टी में पकड़ को मजबूत बनाए रखने नहीं होगा आसान.

2- विधानसभा सदस्य नहीं रहने से कांग्रेस के विधायकों को अपने साथ जोड़े रखने की चुनौती.

3- लोकसभा व विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार का थोपा जा सकता है

यह बनती है संभावना

1- ट्रेड यूनियन की पॉलिटिक्स में रह सकतें हैं एक्टिव, जिससे और हो सकते हैं मजबूत

2- पार्टी संगठन में में मिल सकता कोई बड़ा पद, पर केंद्रीय नेतृत्व को लेना है यह फैसला

गिरिनाथ सिंह, आरजेडी

प्रदेश अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह के चुनाव हारने का असर आरजेडी की प्रदेश राजनीति पर पड़ेगा। लगातार दो बार से चुनावों में मिली शिकस्त ने न सिर्फ उन्हें बल्कि पार्टी को भी झकझोरा है। ऐसे में पार्टी हार की वे जवाबदेही लेते हैं अथवा पार्टी उनपर कोई एक्शन लेती है, यह भी देखनेवाली बात होगी.

इन मोर्चो पर हो सकती हैं मुश्किलें

1- लंबे समय से प्रदेश अध्यक्ष के पद पर काबिज गिरिनाथ सिंह को हटाने की पार्टी में चल सकती है मुहिम.

2- पार्टी में पकड़ होगी कमजोर, कार्यकर्ताओं के भी अलग- थलग होने का है खतरा.

3- राजनीतिक भविष्य पर भी मंडरा रहा है खतरा

4- झारखंड में एक भी सीट नहीं मिलने से विरोधियों के निशाने पर हैं गिरिनाथ सिंह.

संभावनाएं नहीं के बराबर

झारखंड में आरजेडी को एक भी सीट नहीं मिलने से गिरिनाथ सिंह के पास खोने के अलावा कुछ भी नहीं बचा है। पार्टी के अध्यक्ष पद से भी धोना पड़ सकता है हाथ। ऐसे में उनके लिए आगे की राजनीति आसान नहीं होगी.

inextlive from Ranchi News Desk


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