रेलवे में सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर रिक्रूटमेंट घोटाला तीन धरे गए

2019-06-05T13:24:10+05:30

पुलिस ने 5 से 6 और आरोपियों की पहचान की है जिन्होंने इस घोटले में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। फिलहाल पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए उनके लोकेशन को भी ट्रैक कर रही है।

मुंबई (मिड-डे)। रेलवे विभाग में चल रही फर्जी भर्ती घोटाले की जांच में, क्राइम ब्रांच की यूनिट-इलेवन ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में स्थित मनीष सिंह राय के घर से 25 लाख रुपये नकद और बनारस में उनके दूसरे घर से कुछ सोने की जब्ती की है। बताया जा रहा है बनारस में मनीष किराये पर रहता था। एक अधिकारी ने कहा, 'हमने गहनों को जब्त कर लिया है, जिसे आरोपी ने लोगों को जॉब दिलाने के नाम पर ठगने के बाद खरीदा है। उसके पास से काफी नकद पैसा भी बरामद किया गया है। पुलिस ने 5 से 6 और आरोपियों की पहचान की है, जिन्होंने इस घोटाले में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और फिलहाल उन्हें पकड़ने के लिए उनके लोकेशन को ट्रैक करने में जुटी है। इसी बीच, पुलिस ने इस मामले से जुड़े 18 से अधिक पीड़ितों के बयान दर्ज किए हैं। इस मामले में मनीष सहित तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है।

ठगी के कई मामले दर्ज
एक अधिकारी ने बताया, 'नौकरी के नाम पर लोगों को ठगने के कई मामले दर्ज किये गए हैं। अग्रीपाड़ा पुलिस स्टेशन में घोटाले के मामले को लेकर लगभग 8 पीड़ितों ने पुलिस से संपर्क किया है, वहीं साकीनाका में लगभग 25 लोग और नवी मुंबई में 25 से अधिक लोगों ने इस विषय में पुलिस से बातचीत की है।' जांच के दौरान, पुलिस को पता चला है कि आरोपी राजेश कुमार तांती एक फिल्म प्रोडक्शन कंपनी चलाता है, जहां आरोपी सीमा पवार उसके साथ काम करती है। राजेश ने उसे लोगों की तलाश और उन्हें निशाना बनाने के लिए काम पर रखा था, वह लोगों को नौकरी दिलाने के नाम किसी तरह से पैसे देने के लिए राजी कराती थी और बाद में राजेश से मिलवाती थी। पुलिस ने राजेश के बैंक खाते की डिटेल को भी स्कैन किया और पाया कि इस खाते से लगभग 2 करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ था। राजेश नौकरी पाने की चाह रखने वालों से इसी बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर करने के लिए कहता था।
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बन जाते थे नकली रेलवे कर्मचारी
तीनों ने गिरफ्तार होने के बाद पुलिस के सामने यह खुलासा किया कि वह किस तरह से नौकरी पाने वाले लोगों को फंसाने थे, कभी कभी लोगों का विश्वास जीतने के लिए वह रेलवे विभाग के बड़े अधिकारी भी बन जाते थे, वे लोगों से वादा करते थे कि वह उन्हें किसी तरह से जॉब दिला देंगे। वह निश्चित तौर पर जॉब दिलवाने के लिए तीन महीने की ट्रेनिंग कराते थे और इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के नाम पर वह हर एक व्यक्ति से सात लाख रुपये लेते थे। जो भी व्यक्ति फीस के रूप में सात लाख रुपये जमा कर देता था, फिर आरोपी उन्हें ट्रेनिंग सेक्शन में ले जाते थे, जहां अन्य आरोपी वरिष्ठ रेलवे अधिकारियों के रूप में काम करते थे और वह उन्हें नौकरी के बारे में समझाते थे। चूंकि क्लासेस बहुत असली लगती थीं, इसलिए किसी भी पीड़ित को संदेह नहीं होता था।



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