क्रिमिनल इन्‍वेस्‍टीगेशन के लिए आधार का डाटा नहीं शेयर करेगा यूआईडीएआई

2018-06-24T08:30:02+05:30

यूआईडीएआई का कहना है कि आधार अधिनियम के तहत आधार के बायोमेट्रिक डाटा का इस्तेमाल आपराधिक जांच में नहीं किया जा सकता है।

अपराध जांच एजेंसी संग आधार डाटा कभी साझा नहीं किया
नई दिल्ली (पीटीआई)। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने हाल ही में कहा कि आधार अधिनियम के तहत आधार के बायोमेट्रिक डाटा का इस्तेमाल आपराधिक जांच में नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही यह भी यह भी सूचित किया कि किसी भी अपराध जांच एजेंसी के साथ आधार डाटा कभी साझा नहीं किया गया।यूआईडीएआई ने यह एेलान तब किया जब एक दिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के निदेशक ईश कुमार ने अपराध पकड़ने के लिए पुलिस को आधार की सूचनाओं की सीमित उपलब्धता की बात कही थी। यूआईडीएआई  ने कहा कि आधार अधिनियम 2016 की धारा 29 के तहत आधार जैविक सूचनाओं का इस्तेमाल आपराधिक जांच के लिए स्वीकृत नहीं है।
अधिनियम की धारा 33 के तहत बेहद सीमित छूट दी गयी
अधिनियम की धारा 33 के तहत बेहद सीमित छूट दी गयी है। इसमें भी राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला होने पर आधार की जैविक सूचनाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह भी सिर्फ तभी संभव है जब मंत्रिमंडलीय सचिव की अध्यक्षता वाली समिति इसके लिए पूर्व - प्राधिकरण दे चुकी हो।यूआईडीएआई ने यह भी स्पष्ट किया कि 'सु्प्रीम कोर्ट में आधार मामले की चल रही सुनवाई में भी भारत सरकार यही पक्ष रहा है।' यूआईडीएआई ने यह भी कहा है कि आधार अधिनियम के तहत, यूआईडीएआई द्वारा एकत्रित बॉयोमीट्रिक्स डाटा का उपयोग केवल आधार उत्पन्न करने और आधार धारकों की पहचान के सबूत के तौर पर किया जाता है। इसका प्रयेाग किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता है।  

पुलिस को जांच के लिए आधार ब्योरा उपलब्ध कराना चाहिए

इतना ही नहीं यूआईडीएआई ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसने किसी भी अपराध जांच एजेंसी के साथ कभी भी बॉयोमीट्रिक डाटा साझा नहीं किया है।गौरतलब है कि हाल ही में एनसीआरबी निदेशक ने कहा था कि देश में हर साल करीब 50 लाख मामले दर्ज किए जाते हैं। इनमें से अधिकतर मामले पहली बार अपराधियों द्वारा किए जाते हैं। एेसे लोग अपने फिंगरप्रिंट छोड़ते हैं,  लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में वे उपलब्ध नहीं होते हैं। इसलिए पुलिस को जांच के लिए आधार डाटा उपलब्ध कराया जाना चाहिए। एेसा इसलिए  क्योंकि 80 से 85 प्रतिशत मामले पहली बार अपराध करने वाले लोगों से जुड़े होने से इनकी तलाश मुश्किल होती है। एेसे में जांच के उद्देश्य से पुलिस की आधार डाटा तक पहुंच जरूरी है।

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