विचार कागज की नाव की तरह है तो फिर भाव क्या है? ओशो से जानें

2019-04-10T02:00:16+05:30

विचार कागज की नावें हैं। वे तुम्हारी मस्तिष्क की सतह पर डोलते रहते हैं। वहीं आते हैं वहीं से तिरोहित हो जाते हैं। तुम्हारे भीतर तुम्हारी गहराई को उनकी कोई भी खबर नहीं मिल पाती। वे आए इसका भी पता नहीं चलता; कब चले गए इसका भी पता नहीं चलता।

प्रश्न: भक्त भाव से भरा होता है; लेकिन भाव और विचार में हम कब और कैसे सही-सही फर्क कर सकते हैं?

विचार एक आंशिक घटना है, जो तुम्हारे मस्तिष्क में चलती है। भाव एक सर्वांग घटना है, जो तुम्हारे पूरे अस्तित्व में गूंज जाती है; यही फर्क है। विचार तो तुम्हारी खोपड़ी में चलता है। वह तुम्हारे समग्र व्यक्तित्व को ओत-प्रोत नहीं करता। तुम्हारे मन में एक विचार चल रहा है-भगवान का, तो तुम्हारा रोआं-रोआं उस भगवान के विचार से स्नान नहीं कर पाएगा। विचार मन में चलता रहेगा। हृदय की धड़कन में नहीं गूंजेगा। तुम विचार भगवान का करते रहोगे, लेकिन तुम्हारे पैरों को उसकी कोई भी खबर न मिलेगी। तुम्हारे हड्डी, मांस, मज्जा को उसकी कोई खबर न मिलेगी। वह विचार ऊपर-ऊपर चला जाएगा। वह ऐसे ही होगा जैसे सागर पर तुम एक कागज की नाव तैरा दो। वह ऊपर-ऊपर लहरों पर डगमगाती रहेगी। सागर की गहराइयों को पता ही नहीं चलेगा कि ऊपर कोई कागज की नाव भी डांवाडोल हो रही है।

विचार कागज की नावें हैं। वे तुम्हारी मस्तिष्क की सतह पर डोलते रहते हैं। वहीं आते हैं, वहीं से तिरोहित हो जाते हैं। तुम्हारे भीतर तुम्हारी गहराई को उनकी कोई भी खबर नहीं मिल पाती। वे आए, इसका भी पता नहीं चलता; कब चले गए, इसका भी पता नहीं चलता। भाव सर्वांग अवस्था है। जब तुम परमात्मा के भाव से भरते हो तो तुम्हारा मस्तिष्क ही नहीं भरता; मस्तिष्क भरता ही है, तुम्हारा रोआं-रोआं, तन-प्राण सब भर जाता है। परमात्मा के भाव से भरे हुए व्यक्ति को कहना न पड़ेगा कि वह परमात्मा का विचार कर रहा है। तुम देखोगे, तुम पाओगे कि वह परमात्मा को जी रहा है।

विचार और जीवन में जितना फर्क है, उतना ही फर्क विचार और भाव में है। भाव यानी सर्वांगीणता, भाव यानी समग्रता। जब तुम कभी किसी के प्रेम में पड़ जाते हो, तब खोपड़ी में ही थोड़ी प्रेम रहता है! वह तुम्हारे हृदय में भी धड़कने लगता है। तुम्हारे रोएं-रोएं में भी पुलक आ जाती है। तुम्हारी चाल बदल जाती है। प्रेम बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि जिनके जीवन में प्रार्थना नहीं, परमात्मा नहीं, उनके जीवन में तो प्रेम ही एकमात्र घड़ी है, जब वे समग्रता को जानते हैं अन्यथा सभी चीजें खंड-खंड हैं।

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भाव को अगर तुम ठीक से समझ लो, तो वह विचार से बिल्कुल उलटा है, क्योंकि उसका गुणधर्म निर्विचार का है। जितना ही भाव तुम्हें पूरा पकड़ लेता है, उतने ही विचार शांत हो जाते हैं, तरंगें खो जाती हैं। तुम इतनी गहरी अनुभूति से भरे होते हो कि विचार करने की सुविधा कहां? जगह कहां? जरूरत कहां? प्रेम का विचार तो वही करता है, जिसने प्रेम का भाव नहीं जाना। भोजन का विचार वही करता है, जो भूखा है और जिसने भोजन नहीं जाना।

ओशो।


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