जीवन में अत्यधिक दुख होने के बाद भी वैराग्य क्यों नहीं होता? जानें

2019-04-24T11:11:02+05:30

सुख से वैराग्य का जन्म होता है क्यों? क्योंकि जब सुख मिल जाता है तब भी तुम पाते हो कि दुख तो मिटा ही नहीं। सुख भी मिल गया और दुख बरकरार है।

प्रश्न: कभी-कभी जीवन में दु:ख और पीड़ा का इतना अनुभव होता है कि लगता है इससे ज्यादा दु:ख नरक में भी नहीं होगा फिर भी जीवन के प्रति वैराग्य पैदा क्यों नहीं होता?

दु:ख से कभी वैराग्य पैदा होता ही नहीं, सुख से पैदा होता है। दुखी की आशा तो जिंदा रहती है; सिर्फ सुखी की आशा टूटती है क्योंकि दु:ख में ऐसा लगता ही रहता है, कि आज दु:ख है, कल ठीक हो जाएगा। अभी दु:ख है, सदा थोड़े ही रहेगा! और दु:ख में ऐसा भी लगता है, कि कुछ न कुछ रास्ता है इसके पार जाने का। गरीब कितना ही गरीब हो, उसको लगता ही रहता है, अमीर होने का कोई न कोई उपाय है। आखिर दूसरे हो गए हैं इसलिए भिखमंगा कभी विरागी नहीं हो सकता। बड़ा मुश्किल है। भिखमंगे की आशा लगी रहती है, जिसके पास है ही नहीं, वह छोड़ेगा कैसे? जिसके पास है, वही छोड़ सकता है।

सुख से असली वैराग्य पैदा होता है, दु:ख से नकली वैराग्य। इसलिए दु:ख से मैं तुम से कहता भी नहीं कि तुम दु:ख से वैराग्य की तरफ जाना; नहीं। वह कोई ठीक रास्ता नहीं है। अगर तुम दु:ख से वैराग्य की तरफ गए तो कभी मोक्ष के आकांक्षी न बनोगे; ज्यादा से ज्यादा स्वर्ग के क्योंकि दु:खी आदमी सुख मांगता है, आनंद नहीं। आनंद का उसे पता ही नहीं। सुख का ही पता नहीं, आनंद तो बड़ी दूर की बात है और दु:खी आदमी को जो यहां नहीं मिला है, वह परलोक में मांगता है और दु:खी आदमी को जो अपनी कोशिश से नहीं मिला है, वह परमात्मा से मांगता है लेकिन दु:खी आदमी विरागी नहीं हो सकता।

मैंने किसी दु:खी आदमी को कभी विरागी होते नहीं देखा। और अगर हो जाए, तो वह झूठा वैराग्य होगा। तुम्हें अपने संन्यासियों में, अगर तुम इस मुल्क में भ्रमण करो तो सौ में से निन्यानबे प्रतिशत ऐसे संन्यासी मिलेंगे, जो दु:ख के कारण संन्यासी हो गए हैं। दु:ख के कारण जो संन्यास आता है, उस संन्यास में भी दु:ख की छाया पड़ी रहती है और सुख की आकांक्षा बनी रहती है, इसीलिए दु:ख से तुम मुक्त न हो पाओगे और वैराग्य का कोई जन्म दु:ख से न होगा।

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सुख से वैराग्य का जन्म होता है, क्यों? क्योंकि जब सुख मिल जाता है, तब भी तुम पाते हो कि दु:ख तो मिटा ही नहीं। सुख भी मिल गया और दु:ख बरकरार है। जो मिलना था, वह मिल गया; मिला तो कुछ भी नहीं। भीतर तो सब खाली है। धन मिल गया और भीतर की निर्धनता न मिटी। जैसी सुंदर पत्नी चाहिए थी मिल गई, लेकिन कोई तृप्ति न मिली। जैसा पति चाहिए था, मिल गया, लेकिन सब सपने टूट गए। कोई सपना पूरा न हुआ। दु:खी आदमी तो आशा कर सकता है, सुखी आदमी कैसे आशा करेगा? और आशा है राग। वह जो प्रतीति है, वह प्रतीति आशा बंधाती है, कि कोई न कोई रास्ता निकल आए। हम गरीब हैं, इसलिए दुखी हैं। अगर महल होता तो दुखी न होते।

ओशो।


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