माघ में काशी से प्रस्थान कर प्रयाग में क्यों विराजते हैं महादेव? जानें इसका पौराणिक महत्व

2019-02-13T03:05:23+05:30

प्रसन्न हो जाते हैं। इस समय प्रयाग में कुंभ भी चल रहा है ऐसे में प्रमुख स्नान के समय संगम में डुबकी लगाने का भी अपना महत्व होता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस मास में भगवान शिव भी अपनी नगरी काशी छोड़कर प्रयाग चले आते हैं

माघ को भगवान विष्णु का मास कहा जाता है। इस महीने में स्नान करने और स्मरण मात्र से ही श्रीहरि विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। इस समय प्रयाग में कुंभ भी चल रहा है, ऐसे में प्रमुख स्नान के समय संगम में डुबकी लगाने का भी अपना महत्व होता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस मास में भगवान शिव भी अपनी नगरी काशी छोड़कर प्रयाग चले आते हैं और पूरे माघ मास यहीं रहते हैं।

मत्स्य पुराण के अनुसार, देव विश्वकर्मा ने प्रयाग नगर की स्थापना की। इसकी भव्यता और सुंदरता की देवताओं ने प्रशंसा की, इससे विश्वकर्मा बहुत खुश हुए। वे भगवान विष्णु के पास गए और प्रयाग नगरी के गुणों के बारे में उनको बताया। इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि आपकी नगरी में जो भी व्यक्ति अपने प्राण त्यागता है, उसे वैकुण्ठ की प्राप्ति होगी। यह आशीर्वाद मिलने से विश्वकर्मा बहुत खुश हुए। श्रीहरि के आशीर्वाद से प्रयाग की महत्ता बढ़ गई।

वह प्रसन्नचित्त मुद्रा में कैलास पहुंचे और देवों के देव महादेव से अपनी बनाई नगरी प्रयाग के गुणों का बखान किया। उन्होंने भगवान शिव से पूछा कि हे महादेव, आप बताएं कि प्रयाग आपकी नगरी काशी से सुंदर है। इस पर भगवान शिव ने कहा, हां, सुंदर है। फिर विश्वकर्मा ने उनको भगवान विष्णु के आशीर्वाद के बारे में बताया कि जिसकी भी मृत्यु प्रयाग में होगी, वो वैकुण्ठ जाएगा।

इस पर महादेव के मन में यह बात आई कि भगवान विष्णु के आशीर्वाद से प्रयाग की महत्ता बढ़ गई है, ऐसे में उन्होंने विश्वकर्मा से कई बार श्रीहरि के आशीर्वाद वाली बात पूछी। इस पर झल्लाकर विश्वकर्मा ने कहा कि वहां मरने वाला स्वर्ग नहीं जाएगा तो नरक जाएगा। इस पर भगवान शिव ने तथास्तु कह दिया। अब विश्वकर्मा को अपनी गलती का ज्ञान हुआ।

इस पर विश्वकर्मा ने भगवान शिव को श्रीहरि के आशीर्वाद की याद दिलाई। इस पर महादेव ने कहा कि प्रयाग भगवान विष्णु को प्रिय है और वो उनके पूज्य हैं इसलिए अब हर वर्ष माघ मास में काशी छोड़कर वे प्रयाग में रहेंगे और पूरे मास वे वहीं स्नान—ध्यान करेंगे।

— ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट

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