साधना ने बदला जीवन नेशनल कैप्टन बन गई संन्यासी

2019-01-14T09:25:51+05:30

dhruva.shankar@inext.co.in
PRAYAGRAJ: संगम की रेती पर देश- विदेश में अध्यात्म की अलख जगाने वाले संत- महात्माओं के साथ ही संन्यासिनियां भी पहुंच रही हैं। उन्हीं में से एक सहज योगिनी शैलजा देवी हैं। जो जूना अखाड़ा निर्माण व्यवस्था की महामंत्री होने के अलावा किसी जमाने में बास्केटबॉल की महिला टीम की नेशनल कैप्टन रह चुकी थी। राजकोट विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट देवयानी के जीवन में तब बदलाव आया जब 1978 में वह अपने माता- पिता के साथ राजकोट में गुरुदेव दत्तात्रेय के सहज सिद्ध योग केन्द्र में पहुंची। परिसर के मनोरम वातावरण में अपने आप लगातार बारह घंटे तक मौन रहकर ध्यान लग गया। जिसका उनपर इतना प्रभाव पड़ा कि सब कुछ छोड़कर संन्यासिन बन गई.

गुरु के आशीर्वाद से बनीं संन्यासिन
अपने माता- पिता के साथ जब गुरु दत्तात्रेय के राजकोट स्थित केन्द्र में देवयानी ने बारह घंटे ध्यान लगा लिया तो उनकी साधना को देखकर गुरु दत्तात्रेय के सानिध्य में रहने का अनुरोध किया। उसके बाद गुरुदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और नेशनल प्लेयर देवयानी का नाम शैलजा देवी रख दिया। इसके बाद से लेकर चालीस वर्षो से अनवरत सहज योगिनी शैलजा देवी योग साधना की विभिन्न पद्धतियों में से एक सहज सिद्ध योग की साधना में लगी हुई है और उसकी साधना का महत्व अनुयायियों को बता रही है.

आधा दर्जन से अधिक आश्रम
गुरुदेव के सान्निध्य में आने के बाद शैलजा देवी ने सहज सिद्धयोग में कुंडलिनी शक्ति के द्वारा हठ योग, राजयोग, अष्टांग योग व आसन आदि यौगिक क्रियाओं का अभ्यास कराने लगीं। नब्बे के दशक में उनकी ख्याति इतनी फैल गई कि अमेरिका, लंदन व रूस में वह सिद्ध योग का प्रचार- प्रसार करने लगीं। समय की कमी होने की वजह से उन्होंने न्यूयार्क, लंदन व रूस के साथ ही पंजाब, नई दिल्ली, जूनागढ़ व ऋषिकेश में श्री गिरनार साधना आश्रम व त्रिमूर्ति श्री गुरुदत्त सेवा आश्रम स्थापित कर दिया.

महत्वपूर्ण तथ्य

- कस्टम विभाग में बड़े पद पर तैनात पिता की बेटी देवयानी की पैदाईश ईस्ट अफ्रीका के दारल स्लम में हुई थी। जब वे छठवीं क्लास में थीं तब पिताजी इंडिया लौट आएं थे.

- राजकोट में छठवीं क्लास से लेकर राजकोट विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट करने के दौरान देवयानी बास्केटबॉल और बैडमिंटन की बेहतरीन प्लेयर थीं.

- 1975 में देवयानी बास्केटबाल की नेशनल महिला टीम की कैप्टन थीं। राजकोट में रहकर उन्होंने बैडमिंटन में स्टेट लेवल की आधा दर्जन से अधिक प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया था.

- 1973 से 1975 के बीच उन्होंने 50 मेडल और प्रमाणपत्र हासिल किया था.

मेरे जीवन में बदलाव गुरुदेव की शरण में आने के बाद आया। राजकोट में सहज सिद्ध योग शिविर में एक दिन माता- पिता के साथ पहुंची तो अपने आप साधना में मन लग गया। वह भी बारह घंटे लगातार। उसके बाद जीवन पूरी तरह से बदल गया और चालीस वर्षो से संन्यासी के रूप में योग की अलख जगा रही हूं। प्रयागराज में दूसरी बार कुंभ मेला में आने का अवसर प्राप्त हुआ है.

सहज योगिनी शैलजा देवी, जूना अखाड़ा

inextlive from Allahabad News Desk


This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy  and  Cookie Policy.