भोजपुरी की लाज बचाने को सीख रहे संस्कार गीत

2019-06-24T11:06:10+05:30

भोजपुरी का नाम जेहन में आते ही डबल मिनिंग सॉग्स और अश्लीलता वाले गानों का खाका उभर आता है भोजपुरी बोली की मिठास और विलुप्त होते पारंपरिक गीतों को सीखने की ललक यूथ्स को अपनी तरफ बरबस खींच ले जा रही है

- बर्थ सॉन्ग्स से लेकर शादी-विवाह तक के गीतों की धूम

- सिटी के स्कूल में चल रही लोकगायन की कार्यशाला

GORAKHPUR : भोजपुरी का नाम जेहन में आते ही डबल मिनिंग सॉग्स और अश्लीलता वाले गानों का खाका उभर आता है। भोजपुरी बोली की मिठास और विलुप्त होते पारंपरिक गीतों को सीखने की ललक यूथ्स को अपनी तरफ बरबस खींच ले जा रही है। शहर के अंदर चल रही कार्यशाला में हाईली एजुकेटेड स्टूडेंट्स के पार्टिसिपेट करने से इसकी अहमियत बढ़ गई है। संस्कृति निदेशालय उत्तर प्रदेश, भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ इंडिया के तत्वावधान में गांधी गली स्थित एसएस एकेडमी में पारंपरिक लोक गायन कार्यशाला भोजपुरी के गीतों को सीखने के लिए भीड़ जुट रही। चीफ ट्रेनर राकेश श्रीवास्तव ने बताया कि विलुप्त होते लोकगायन को सीखने के लिए होड़ मची है। 15 जून से शुरू हुए कैंप का समापन दो जुलाई को होगा। कैंप में प्रतिभागियों के उत्साह को देखकर ऐसा लगा कि विलुप्त होती परंपरा को पुनर्जीवित करने में इनका काफी सहयोग मिलेगा।

मांगलिक कार्यक्रमों से गायब होते जा रहे लोकगीत

शहर और आसपास के क्षेत्रों में शादी-विवाह सहित अन्य मांगलिक कार्यक्रमों में पारंपरिक रूप से गायन होता था। महिलाओं और युवतियों की टोली गायन से कार्यक्रम की गरिमा में चार चांद लगाती थीं। लेकिन धीरे-धीरे यह चीजें गायब होने लगी। भागमभाग में सिर्फ गिनीचुनी जगहों तक यह सिमटकर रह गया। नई पीढ़ी को इससे रूबरू कराने के लिए कार्यशाला का आयोजन शुरू किया गया। इसमें शामिल होने के लिए सोशल मीडिया सहित अन्य माध्यमों से प्रचार प्रसार किया गया। टीम के प्रयास से 46 प्रतिभागियों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया। इसमें खास बात यह है कि छोटी बच्चियों से लेकर साइंस और मैथ्स में ग्रेजुएशन कर चुके यूथ्स भी प्रतिभाग कर रहे हैं। हाउस वाइफ और संगीत की शिक्षा ले रही स्टूडेंट्स भी इसमें बढ़चढ़कर भागीदारी निभा रही हैं।


इन गीतों को सीख रहे पार्टिसिपेंट्स

शादी संस्कार के गीत, सगुन के गीत, हल्दी, मटकोड़वा, विदाई, मौसम, होली, चैता, कजरी इत्यादि।

 

मैं कभी जब गीतों को सुनती थी तो अच्छा लगता था। मुझे पता लगा कि इस तरह का कैंप चल रहा है तो मैं खुद को रोक नहीं पाई। हमारी पीढ़ी को यह जानने की जरूरत है कि हमारी परंपरा क्या रही है। मैंने बीकाम एकाउंटेंसी की पढ़ाई पूरी करने के बाद चार साल तक एक फर्म जॉब किया है।

नीलू- पार्टिसिपेंट

मैं एक हाउस वाइफ हूं। जब हम लोग छोटे तो ऐसे गीत सुनाई पड़ते थे। लेकिन आज के बदलते परिवेश में इसकी महत्ता खत्म हो जा रही है। मेरे दो बच्चे हैं। मैं उनको घर पर छोड़कर पारंपरिक गीतों को सीखने आती हैं। आने वाली पीढ़ी को भी इसके बारे में बताऊंगी।

विभा सिंह, हाउस वाइफ

 

मैंने एमएससी की पढ़ाई की है। वर्तमान में एक स्कूल में टीचर भी हूं। समय निकालकर मैं रोजाना यहां कैंप में शिरकत करती हूं। मुझे यहां पर आकर गीतों को सीखना अच्छा लगता है। स्कूल में स्टूडेंट्स को भी मैं बच्चों को इसके बारे में बताऊंगी।

शैलजा, पार्टिसिपेंट

 

मेरा बीएड फाइनल हो चुका है। हमारी पीढ़ी में लोगों को इन सब चीजों को जानने की जरूरत है। भोजपुरी की मिठास को तब तक महसूस नहीं किया जा सकता है। जब तक कोई इसको सीखेगा नहीं तब तक इसके बारे में जान पाना मुश्किल है।

ऐश्वर्या, पार्टिसिपेंट

 

मुझे संगीत में रूचि है। भोजपुरी में खासकर पारंपरिक गीत ज्यादा आकर्षित करते हैं। यहां आकर मैनें कई नई चीजें सीखी हैं। इसे जारी रखने के लिए आगे भी लोगों को बताना होगा।

अनुराधा, पार्टिसिपेंट


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